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परिवार ही काम आता है
परिवार ही काम आता है
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© VIVEK ROUSHAN

Drama Inspirational Tragedy

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रोज़ी अपने पुरे परिवार के साथ कोलकत्ता में रहती थी । रोज़ी के पिता का कबाड़ी का दूकान था जिससे पूरे परिवार का खर्च निकलना मुश्किल होता था इसलिए रोज़ी,रोज़ी की माँ और रोज़ी की तीनो बहनें दूसरों के घर जा-जा कर खाना बनाया करते थे। रोज़ी भी दो-तीन घरों में जा कर खाना बनाया करती थी। उसमें से ही एक घर था शंकर का। शंकर कोलकत्ता में ऑटो चलाया करता था और अकेला रहता था। रोज़ी अभी २० साल की थी,सुन्दर भी थी। रोज़ी की तरफ शंकर आकर्षित होने लगा और एक दिन रोज़ी की तरफ शादी का प्रस्ताव रख दिया। शंकर भी कद-काठी का अच्छा था और रोज़ी भी शंकर से आकर्षित थी। शंकर का प्रस्ताव सुन कर रोज़ी मन ही मन खुश हो रही थी और उसने शंकर के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। रोज़ी ने यह बात जा कर अपने घरवालों को बताई, रोज़ी के घरवाले बहुत गुस्सा हुए और उसको शादी करने से मना करने लगे।

रोज़ी जवान थी और अक्सर लोग जवानी में दिमाग से नहीं दिल से हीं फैसला करते हैं, रोज़ी ने भी ऐसा ही किया और शंकर के साथ अगले दिन भाग कर दिल्ली चली गई। दिल्ली जाकर रोज़ी और शंकर ने शादी कर ली। इधर कोलकत्ता में रोज़ी के माता-पिता और बहने बहुत परेशान थी, रोज़ी को खोजने के लिए वो लोग भी वहाँ से दिल्ली चले आये अपना सारा कारोबार छोड़-छाड़ कर। दिल्ली में रोज़ी की मौसी रहती थी। दिल्ली में ही उन लोगो नें अपना कारोबार लगा लिया और रोज़ी का इंतज़ार करते रहे।

शादी के एक साल बाद रोज़ी को एक बेटी हुई, रोज़ी खुश थी। बेटी होने के कुछ दिन बाद से ही शंकर का व्यवहार रोज़ी के प्रति बदल गया था, शंकर अब देर रात तक घर नहीं आता था और कभी-कभी पूरी रात ही बहार बिता देता था। रोज़ी बहुत परेशान थी शंकर के इस व्यवहार से,रोज़ी ने इस बात का जिक्र शंकर से किया, दोनों में कहा-सुनी भी हुई और दोनों एक दूसरे से लड़े भी। रोज़ी जानना चाहती थी की आखिर पुरे-पुरे रात शंकर कहाँ रहता हैं, इसलिए रोज़ी ने शंकर के एक दोस्त से मदद माँगी जो घर पर अक्सर आया जाया करता था। कुछ दिन बाद शंकर के दोस्त ने रोज़ी को बताया की शंकर एक औरत के घर रुकता हैं। रोज़ी यह बात सुन कर परेशान हो गई और जब शंकर आया तो रोज़ी ने उसको बोला की "रात-रात भर तुम जहाँ रहते हो मुझे पता है।" रोज़ी की बात सुनते ही शंकर ने बोला की "हाँ में जाता हूँ और वही जाऊँगा और अब मैं तुम्हारे साथ नहीं रहना चाहता हूँ।"

दोनों में लड़ाई-झगड़े हुए और कुछ दिन बाद शंकर ने रोज़ी को छोड़ दिया। रोज़ी रोती-बिलखती रही पर इसका कोई असर शंकर पर नहीं हुआ, क्यूँकि शंकर ने रोज़ी से कभी प्यार किया हीं नहीं था, वो तो बस अपनी जिस्म की आग को ठंडा करने के लिए रोज़ी से झूठा विवाह रचाया था। रोज़ी पूरी तरह टूट चुकी थी, उसको अपने परिवार की बात नहीं सुनने का भी मलाल हो रहा था, वो अब अपने परिवार के पास जाना चाहती थी। अगले दिन रोज़ी अपनी बच्ची को लेकर अपने मौसी के पास चली गई। अपनी सारी आपबीती रोज़ी ने अपनी मौसी को बताया। रोज़ी के परिवार के लोग भी आ गए थे और रोज़ी की आपबीती सुनने के बाद उनका गुस्सा ठंडा हो गया और उन्होंने रोज़ी को अपना लिया था। तीन साल बाद रोज़ी की शादी रोज़ी के पिता ने एक विधुर से करवा दी जो ठीक-ठाक कमा लेता था। रोज़ी अपनी बच्ची के साथ खुश रहने लगी।

जब हम किसी से प्यार करते हैं तो हमे अपने प्यार के अलावा कुछ नहीं दिखता, अपने प्यार की बात के अलावा किसी और की बात हमें रास नहीं आती, हम अपने परिवार, माता-पिता के बातों को भी नज़रअंदाज़ कर देते हैं और अपने प्यार को पाने की खातिर अपने परिवार से दूर हो जाते हैं। हम अपने स्वार्थ के लिए अपने माता-पिता की वर्षो के मेहनत को भूल जाते हैं। हम जवानी के जोश में कुछ ऐसे फैसले कर लेते हैं जिसका परिणाम हमे आगे जा कर चुकाना पड़ता है। और जब हम किसी घोर संकट में फँस जाते हैं तो जिस परिवार को छोड़ कर गए रहते हैं अपने स्वार्थ की खातिर वही परिवार हमारा, सहायता करता है, हमारे दुखों पर मरहम लगाता हैं और हमारे ज़िन्दगी के सफर को आगे बढ़ाता है। रोज़ी की तरह ही बहुत लड़कियाँ इस झूठ के प्यार का शिकार बनती हैं।

परिवार साथ लघुकथा जीवन बदलाव समाज प्रेम

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