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तो आज यह दिन ना देखना पड़ता
तो आज यह दिन ना देखना पड़ता
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© Abasaheb Mhaske

Drama Tragedy

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सवाल यह नही हैं की, तू हारी या मैं, कौन जीता यह कुछ भी मायने नहीं रखता ! सवाल यह है की क्या हम वर्तमान में खुश हैं ? गलती दोनों की थी। तेरा घमंड और मेरी यह अकड़, मेरा गुस्सा, तेरा चुप रहकर सिर्फ घरवालों के इशारे पर चलना, उनका फैसला न चाहते हुए भी सबकुछ सहना, और मेरा इतना सबकुछ होते हुए सिर्फ देखना दोनों को भारी पड़ गया !

काश ! तू थोड़ी-सी हिम्मत जुटा पाती, मेरा साथ देती तो यह दिन ना देखना पड़ता ! मेरा क्या है सबकुछ तय था, निश्चित था पर तू ऐन वक्त पर घबराई और तूने बगैर पूछे ही अकेले ही फैसला लिया ! मैं भला क्या करता ? मैं तुझसे बेपनाह प्यार करता था और तुझे हमेशा खुश देखना चाहता था ! काश ! तेरा मुझपर भरोसा होता, तू मुझे एक मौका देती शायद आज यह दिन यह दिन ना देखना पड़ता ! हो सकता है तुझे मौका नहीं मिला, पापा ने धमकाया होगा ! तेरी मजबूरी, मेरा लिया हुआ वह फैसला, तो यही सही ! नहीं जीवनसाथी तो क्या हुआ, समझकर तुझे माफ किया था !

नहीं जीवनसाथी बनी तो क्या हुआ ? अच्छी दोस्त ही सही, फिर तू एक दिन मुझे मिली बिल्कुल पहले जैसी, हँसती-खिलती फूल की तरह महकती, चिड़िया जैसी चहकती, अपने विश्व में मगन अच्छा लगा तेरा घर संसार देखके मैं मन ही मन खुश हुआ ! फिर तूने दोस्ती का हाथ बढ़ाया, मैं थोड़ा-सा सहमा सहमा-सा, डरा हुआ था पर तू बिल्कुल आत्मिवश्वास से भरपूर नज़र आ रही थी !

मैं तुझे टालता रहा पता नहीं एक अजब-सी घबराहट हो रही थी ! या और कुछ लेकिन तू तो पहले जैसी दोस्ती का फर्ज निभाती रही ! और एक दिन फिर अचानक गायब हुई ! मुझे पछातावा भी हुआ कि मैं इतना क्यूँ दूर-दूर रहा ! क्यूँ नहीं अच्छा दोस्त बन सका ? सचमुच दोस्ती के काबिल मैं हूँ ही नहीं ! मेरी अकड़ गयी नहीं अब तक, खुद को कोसता रहा ! बड़ा दुःख हुआ क्यूँ हम पहले जैसी दोस्ती न निभा पाये ? और कुछ दिन बाद फिर तेरी खबर मिली भी तो क्या सबकुछ खतम, पलभर में जो कुछ था छीन लिया और अब सिर्फ वीरान-सी जिंदगी नसीब आई !

सबकुछ उसकी मर्जी मान भी ले तो क्यूँ ? आखिर क्यूँ अच्छे और सच्चे लोगों के नसीब में भुगतना आता है यह सब, मुझे दुःख भी रहेगा की मैं उसके लिये कुछ ना कर सका ! जिंदगी में अच्छे-बुरे जो भी फैसले लिये जाते हैं, उसका ऐसा भविष्य बनाने या बिगाड़ने में असरदार साबित होता है ! काश ! यह सब ना होता, तब तू थोड़ी-सी दो पल चलती, थोड़ी-सी हिम्मत जुटा पाती, तो दोनों की भी जिंदगी सवर जाती ! तो आज यह दिन ना देखना पड़ता !

कहानी वक़्त इंसान फैसला हिम्मत परिवार जीवन

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