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फेसबुकियन
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© Anwar Suhail

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 साहनी साहब ने फेसबुक लॉग इन किया।

जूसीपुस्सी69 ऑन-लाइन मिली।

साहनी साहब ने चैटिंग पैड पर टाइप किया - ‘‘हैलो बेब’’

तत्काल जवाब मिला - ‘‘हाय सैक्सी’’

‘‘आज क्या पहन रखा है?’’

‘‘क्या कुछ पहनना जरूरी है?’’

‘‘ओ, मीन्स?’’

‘‘इट डज़न्ट मैटर!’’

‘‘जस्ट आई वान्ट टू सी यू इन पिंक टाप!’’

‘‘या, आयम इन पिंक टाप’’

अचानक डाटा इनकमिंग में प्रॉब्लम आई। वार्तालाप में बाधा आई।

सहानी साहब ने टाइप किया- ‘‘शिट’’ और नेटवर्क कनेक्शन चेक करने लगे।

वहां उन्होंने अपना यूज़र आईडी बनाया हुआ है ‘हाटीपाटी007’। इस फर्जी आईडी को सपोर्ट करने के लिए उन्होंने जी मेल पर अपना मेल आईडी बनाया हुआ है - ‘हाटीपाटी007 एटम जी मेल डट काम। वैसे उनका ऑफीशियल आईडी दूसरा है। साइबर-संसार की अद्भुत माया है, जहां आदमी अपनी असली आइडेंटिटी छुपा कर किसी भी जाली आईडी और विवरण पर ईमेल एकाउण्ट खोल सकता है। नौजवान लड़के लड़कियों के नाम पर फेसबुक जैसी सोशल साइट्स पर करोड़ों रोचक जानकारियां अपलोड हैं। अपनी फोटो की जगह वे किसी बॉलीवुड की हिरोइन को फोटो चिपका देते हैं या फिर एडल्ट साइट से न्यूड थम्बनेल अपलोड कर देते हैं। नए-नए फेसबुक  रसिक इन नकली लड़कियों से चैट करते हैं और बातों-बातों में अपनी असलियत बता कर ठगी का शिकार होते हैं। बहुत सारी वेबसाईट्स तो ऐसी हैं जो धीरे- धीरे आपके कांफीडेंशियल डिटेल्स पता कर लेते हैं और आपके बैंक एकाउण्ट तक से छेड़खानी करने लगते हैं। नाइजीरियन युवा तो जाली ईमेल भेज कर लाखों डॉलर की लाटरी आपके नाम निकाल देते हैं और मौका पाकर उस लाखों डॉलर पाने के लिए आपसे हजारों रुपए ऐंठ लेते हैं। आए दिन अख़बारों में ऐसे किस्से आते ही रहते हैं कि साइबर अपराध के जरिए अमुक व्यक्ति इतने हज़ार या इतने लाख की ठगी का शिकार हुआ है।

 ‘हाटीपाटी007’  वाले एकाउण्ट में साहनी साहब ने अपनी डिटेल्स में उम्र दिखाई है इक्कीस वर्ष। शैक्षणिक जानकारी में उन्होंने डाला हुआ है कि वे मेडिकल की पढ़ाई पढ़ रहे हैं। अपनी फोटो की जगह शाहिद कपूर की फोटो अपलोड की है। बहुत सारी लड़कियां और लड़के उनके फॉलोअर बन चुके हैं। लड़कियां उन्हें एक टैलेण्टेड युवक जानकर उनपर जान छिड़कती हैं और फॉलोअर लड़कों में अधिकांश ‘गे’ हैं। वे जिस्मानी ताल्लुकात के लिए चैट करते हैं। कई फेसबुकियन तो अपनी साइट्स पर एडल्ट सामग्री अपलोड किये हुए हैं। कुल मिलाकर फेसबुक एक चटपटी सोशल वेबसाइट है। इसीलिए साहनी साहब फेसबुक को चिरकुट भी कहते हैं। वाकई इस सोशल-साईट पर अधिकतर चिरकुट ही आते हैं।

साहनी साहब फुरसत के क्षणों में इंटरनेट चलाते हैं। पहले तो उन्होंने शेयर मार्केट की उथल-पुथल को जानने के लिए नेट का सहारा लिया था लेकिन धीरे-धीरे सोशल साइट्स पर भी जाने लगे। खाली समय में पोर्न साइट्स को भी खंगालते हैं साहनी साहब। ऐसा नहीं है कि साहनी साहब के वैवाहिक जीवन में कोई कमी है लेकिन बचपन से उनके अंदर यौन-जिज्ञासा कूट-कूट कर भरी हुई है। वैसे तो वह महिलाओं से बड़ा सौम्य व्यवहार किया करते हैं। उनकी शराफ़त के किस्से हर जगह मशहूर हैं लेकिन जाने क्या बात है कि वे एकांत में विचलित हो जाया करते हैं।

साहनी साहब याद करते हैं अपना बचपन कि जब सत्यम् शिवम् सुंदरम् रिलीज़ हुई थी तब ज़ीनत अमान के शॉट्स को लेकर कितना हाय-तौबा मचा था। राजकपूर की उस कलात्मक फिल्म को एक तरह से वयस्क फिल्म का दर्जा मिला हुआ था। राजकपूर ने स्त्री शरीर और मन को अलगियाया था। जिसमें स्त्री के मन की सुंदरता का बखान किया गया था, लेकिन संसार तो स्त्री देह की सुंदरता को पसंद करता है। वर्जनाओं के चलते, साहनी साहब ने उस समय वह फिल्म नहीं देख पाए थे। यहां तक कि ‘बॉबी’, ‘राम तेरी गंगा मैली’ जैसी पिक्चरें भी वह उस समय नहीं देख पाए थे। बाद में जब उन्होंने इन पिक्चरों के देखा तो लगा कि इमरान हाशमी और मल्लिका शेरावत यदि उस समय फिल्मों में आते तो भूखे मर जाते। अमूमन पारिवारिक माहौल की कहानियां हुआ करती थीं तब, जिनमें हिरोइन अपने जिस्म की नुमाइश नहीं करती थीं। यहां तक कि फिल्मी गाने भी द्विअर्थी नहीं हुआ करते थे। फिल्म ‘विधाता’ में जब ‘सात सहेलियां खड़ी-खड़ी’ गाना आया तो उस पर बड़ा वबाल मचा था।

फिर जब ‘चोली के पीछे क्या है’ गाना आया तो बाकायदा उस पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस-मुबाहसे हुए थे। जब देश में कलर टेलीविज़न और वीसीआर आया तब जाकर विदेशी नीली फिल्में एक ख़ास तबके तक पहुंचीं। टेक्नोलॉजी के एडवांस होते-होते नीली फिल्में अब तो मोबाइल के सेट पर उपलब्ध हो रही हैं। थ्री-जी के मोबाइल सेट नौजवानों में इसीलिए तो लोकप्रिय हो रहे हैं। अब तो सुनते हैं कि फोर-जी टेक्नोलॉजीज वाले सेट विदेशों में आने लगे हैं। खुदा ख़ैर करे...!

साहनी साहब ने अपनी नौकरी के शुरुआती दौर को याद किया। तब उनकी पोस्टिंग शहडोल में हुई थी। वह सिंचाई विभाग में सब-इंजीनियर थे। काम का दबाव न था। शादी के लिए देखा-देखी चल रही थी। उनका परम-मित्र था मनोज अग्रवाल जो कि एक ठेकेदार था। मनोज अपनी मारुति में लादकर, उनके आवास पर कलर-टीवी और वीसीपी लाता था। साहनी साहब अमिताभ बच्चन के बड़े फैन थे। मनोज अग्रवाल ने उन्हें अमिताभ बच्चन की कई मूवी दिखाई थीं। ‘दीवार’ और ‘सिलसिला’ उनकी पसंदीदा पिक्चरें थीं। अमिताभ की पिक्चर देखने के बाद वे लोग नीली फि़ल्में देखा करते थे। वीसीपी में एक ख़ासियत थी कि कभी कभी उसका टेप फंस जाता था। कभी पिक्चर-क्वालिटी ख़राब आती थी।

काम के सिलसिले में साहनी साहब जब भी भोपाल जाते तो वहां खाली समय में ‘केवल वयस्कों के लिए’ वाली पिक्चर देखा करते थे। माना कि ऐसी फिल्मों वाले सिनेमा हाल खटमल और गंदगी का पर्याय हुआ करते थे। लेकिन क्या करें वो। भोपाल के अच्छे सिनेमाघर तो ऐसी फिल्में लगाने से रहे। साहनी साहब क्या करते, स्टेटस देखें या दिल की सुनें।

 

शादी हुई और सरला के रूप में खूबसूरत पत्नी मिली। दहेज में अन्य सामानों के साथ मिला कलर टीवी और एक अदद वीसीडी प्लेयर। उनकी धर्मपत्नी सरला अपने नाम के अनुसार सात्विक और साधु स्वभाव की निकलीं। जब एक दिन उन्होंने वो वाली वीसीडी सरला को दिखलाई तो वह नाराज़ हो गईं। सरला नहीं जानती थी कि शरीर के गोपन रहस्यों की मर्यादा को किस तरह से संसार में देखा-दिखलाया जा रहा है। उसका सनातन मन और दिमाग किसी तरह से साहनी साहब से तारतम्य नहीं बिठा पा रहा था। सरला ने साहनी साहब की खूब लानत-मलामत की। साहनी साहब ने अपने तईं समझाना चाहा कि जिन्दगी हर समय साफ-सुथरी और सात्विक नहीं रहा करती है। शादी के बाद की जिन्दगी में तो ये सब होना ही चाहिए। आखिर हमारे ऋषि-मुनियों ने भी काम से हार मानी थी। खजुराहो की मूर्तियां क्या हमारी सांस्कृतिक विरासत नहीं हैं। आचार्य रजनीश भी तो कहा करते हैं कि संभोग से समाधि मिलती है। कितने बड़े-बड़े विद्वान आचार्य रजनीश के शिष्य हैं। पति-पत्नी के बीच हमेशा साफ-सुथरी बातें नहीं होनी चाहिए। कभी-कभी जिन्दगी को ग़लाज़त से लबरेज़ भी होना चाहिए। इससे टेस्ट चेंज होता है और जि़न्दगी के कैनवास में नए रंग भरते हैं।

सरला उनके भोथरे तर्कों से पराजित नहीं हुई।

आत्म-रति के अभ्यस्त साहनी साहब ने फिर ये रास्ता निकाला कि जब सरला मैके जाती, वो धड़ल्ले से मनपसंद वीसीडी देख लिया करते। स्खलन के क्षणों में साहनी साहब को अपनी इस नामुराद आदत पर ग्लानि होती। वे प्रण करते कि अब सादगी भरा संयमित जीवन जिएंगे। लेकिन क़समें तो तोड़ने के लिए ही खाई जाती हैं।  वीसीडी किराए पर मिल ही जाती थी। कई वीडियो पार्लर वालों से साहनी साहब का व्यक्तिगत परिचय था। इन वीडियों को साहनी साहब अपनी पर्सनल फाइलों के बीच छुपा कर रखते ताकि बच्चों के हाथ न लगें।

साहनी साहब जब टूर पर होते तो होटल के कमरे में वीसीडी देखने का जुगाड़ बना लिया करते। होटल के नौकर चंद टुकड़ों की खातिर उनकी जी-हुजूरी करते।

 एक बार की बात है। भोपाल की एक सीडी पार्लर में साहनी साहब पहुंचे। चेहरा-मोहरा, चाल-ढाल और गेट-अप से अधिकारी तो दिखते ही हैं। जब उन्होंने पार्लर के लड़के से इधर-उधर की सीडी खरीदने के बाद सीधे नीली फि़ल्मों की सीडी मांगी, तो वह उन्हें अजीबो-गरीब नज़र से देखने लगा और बोला -‘‘हम लोग ये धंधा नहीं करते।’’

 साहनी साहब को बहुत बुरा लगा था। क्या करते, जबकि आए दिन छापामारी में इन्हीं जैसी सीडी की दुकानों से अवैध नीली फि़ल्मों का ज़ख़ीरा बरामद होता है। उन्हें अपनी आदत पर उस दिन कोफ़्त हुई थी। उन्होंने अपने को काफ़ी लानत-मलामत की थी। क्यों उन्हें इन फि़ल्मों का चस्का लगा हुआ है। कितनी बेइज्जती होती है। उन्होंने प्रण किया था कि अब वे स्वयं कभी इस तरह की सीधी नहीं खरीदेंगे। भले से पुरानी पड़ी सीडियों को हज़ार बार देख लेंगे।

कई बार आत्म-ग्लानि के क्षणों में उन्होंने फाइल में छुपाई हुई सीडियों को आवास के पिछवाड़े फेंका भी है लेकिन फिर जाने कैसे-कैसे नई सीडियां उन तक आ जाती हैं।

एक बार तो ग़ज़ब हो गया। उन्होंने नया-नया कम्प्यूटर चलाना सीखा था, तब एक बार पोर्न साइट्स पर एक ऐसा एडल्ट पॉप-अप आया कि कम्प्यूटर की स्क्रीन पर आ जमा। उन्होंने कई तरकीबें की कि वह सीन स्क्रीन से ग़ायब हो जाए, लेकिन सीन हिला नहीं। उन्होंने टास्क-मैनेजर से उसे डिलीट करना चाहा। असफल रहे। कम्प्यूटर को शट-डाउन करना चाहा, नहीं हुआ। तब उन्होंने कम्प्यूटर को पावर ऑफ कर बंद किया। फिर दुबारा कम्प्यूटर ऑन किया तो एडल्ट सीन उसी तरह वाल-पेपर पर स्थिर था। वह घबरा गए। चूंकि बेटा तब छोटा था और कम्प्यूटर को सिर्फ वही चलाया करते थे। इसलिए उन्होंने चुपचाप कम्प्यूटर ऑफ किया और बाज़ार से दो हज़ार रुपए का एक एण्टी-वायरस ले आए। एण्टी-वायरस डालने के बाद कहीं जाकर कम्प्यूटर नार्मल हुआ था।

 

साहनी साहब का बेटा गौरव ग्यारहवीं का छात्र है। वह भी कम्प्यूटर पर काम है। सीधा-साधा सुशील बच्चा है गौरव। एकदम शर्मीला। हमेशा अपनी मम्मी के आंचल में पनाह लेने वाला। नगर में अच्छे ट्यूटोरियल नहीं है। इसलिए आन-लाइन कोचिंग की व्यवस्था की साहनी साहब ने। इसके लिए बच्चे का ईमेल आईडी भी बना दिया। गौरव अपनी आईडी पाकर बड़ा खुश हुआ। साहनी साहब ने उसका जी मेल एकाउण्ट बनाया था। गौरव साहनी साहब को आरकुटिंग करते देखा करता था। साहनी साहब ने कई बार गौरव को जी मेल पर चैट करते देखा और डांटा भी था कि समय बर्बाद न किया करो लेकिन गौरव कहां मानने वाला था।

गौरव का दोस्त था सोहन। बैंक मैनेजर का बेटा। इस दोस्ती के कारण साहनी साहब की बैंक मैनेजर से पहचान हो गई थी। शाम को गौरव, सोहन के घर चले जाता।  कहता कि डाउट-क्लियर करते हैं वे और थोड़ा घूम-फिर लेते हैं। वह समय साहनी साहब का नेट पर बैठने का होता तो वह भी नहीं चाहते थे कि उनके घर में विघ्न रहे और वह निष्कंटक इंटरनेट का मज़ा ले सकें। सरला कम्प्यूटर को अपनी सौतन कहा करती। बड़बड़ाते हुए उनके सामने चाय और बिस्कुट रख दिया करती।

जूसी-पुस्सी के अलावा भी कई ऐसे फेसबुकियन्स थे जिनसे साहनी साहब हाटीपाटी007 बनकर चैट किया करते थे। वह प्राइवेट मूड पर नेट चलाया करते और काम खतम करने से पूर्व सभी हिस्टरी को क्लियर कर दिया करते थे। यहां तक कि कूकीज़ को भी डिलीट कर दिया करते थे। वह नहीं चाहते थे कि कोई ये जान पाए कि उन्होंने कौन-कौन सी वेबसाइट्स पर सर्फिंग की थी।

 

एक दिन ग़ज़ब हो गया और साहनी साहब ने अंततः घर का ‘ब्रॉडबैंड कनेक्शन’ कटवा दिया।

हुआ ये कि साहनी साहब कार्यालय के काम से टूर पर गए।वापस लौटे सुबह के दस बजे। गौरव की छुट्टी थी। घर में लाइट गोल थी। गौरव उनकी बाइक लेकर अपने दोस्त सोहन के घर गया हुआ था। साहनी साहब नहा-धोकर और नाश्ता करके रीते तब तक लाइट आ गई। उन्होंने सोचा कि इस बीच अपना इनबाक्स चेक कर लें। उन्होंने कम्प्यूटर आन किया। इंटरनेट कनेक्ट करके वेब-ब्राउज़र खोला। देखा कि ऑप्शन बॉक्स पर लिखा आ रहा है - ‘‘रिज़्यूम साइट्स’’ इसका मतलब था कि गौरव नेट चला रहा था कि लाइट चली गई थी। उन्होंने ‘यस’ पर क्लिक किया।

 फेसबुक पेज खुल गया।

साहनी साहब तो जब भी नेट यूज़ करते आखिर में ‘साइन-आउट’ ज़रूर करते हैं, ताकि ‘रि-स्टार्ट’ करने में पेज बिना ‘लॉगिन’ के न खुलें। इसका मतलब बेटे गौरव ने फेसबुक पर काम किया था और अचानक लाइट चले जाने के कारण ‘साइन-आउट’ नहीं कर पाया होगा।

लेकिन यह क्या?  खुला हुआ पेज तो ‘जूसी-पुस्सी’ का था।

‘जूसी-पुस्सी’ माने साहनी साहब की फेसबुक फ्रेण्ड!

साहनी साहब के होश उड़ गए।

यानी अब तक जिस ‘जूसी-पुस्सी’ से साहनी साहब ‘हाटीपाटी007’ नाम से चैटिंग किया करते थे, वह कोई सैक्सी लड़की नहीं बल्कि उनका अपना सपूत गौरव ही था।

इसका मतलब बेटा गौरव शाम को जो अपने दोस्त के घर खेलने नहीं जाया करता था, बल्कि नेट चलाने जाया करता था और ‘जूसी-पुस्सी’ निकनेम से उनके साथ चैट किया करता था!

गौरव साहब ने माथा पकड़ लिया और आनन-फानन में इंटरनेट कनेक्शन नोच कर फेंक दिया।

अनवर सुहैल फेसबुक फेस्बुकियन हिंदी कहानी सोशल साइट्स फेसबुक अनवर सुहेल

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