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पश्चाताप की ज्वाला पार्ट-2
पश्चाताप की ज्वाला पार्ट-2
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© Sunita Sharma Khatri

Drama

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भाग -5

उस घर में जिया की माँँ और पिता के बीच लकीर खिच चुकी थी। वह बड़ी बेटी व दमाँद के साथ व्यस्त रहते। माँ छोटी बेटी व उसके बच्चे के साथ समय बिताती।

दीपक का लालच पहले से भी ज्यादा बढ़ने लगा। जमीन-जायदाद कैसे हासिल करे वह इसी फिराक में रहता। उसकी परेशानी बढ़ने लगी क्योंकि नन्नू अब बड़ा हो चुका था। वह अपने नाना के साथ हरदम उनके हर काम में मदद करता, एक तरह से वह अपने नाना का दाहिना हाथ बन गया। यह देख नानी और मौसी की जलन, जिया और बेटे नन्नू से बढ़ने लगी।

मौसा के हाथ से नन्नू निकल चुका था। रवीश अपने काम में रहते, दोस्तों ने शराब की ऐसी लत लगाई कि वह पत्नी की बीमारी का गम शराब के जरिये दूर करते।

जिया व रिया दोनो बहनों का रिश्ता लगभग खत्म ही हो चला था। दीपक उस पर अत्याचार न करे इसके लिए जिया एक ही घर में रहते हुए भी दूरी बनाये रखती। रिया कभी कोशिश भी करती अपनी बड़ी बहन के नजदीक जाने की तो माँ और दीपक अपनी बातों से उसके पैरों में बेडियाँ डाल देते, वह मन-मनोस कर अपनी बड़ी बहन जिया से दूर होती गयी, दोनो अपने अपने बच्चें को संभालने में व्यस्त रहने लगीं। लेकिन जिया का मानसिक अवसाद व कमजोर शरीर इसमें बाधा बनने लगा, न जाने नियति क्या चाहती थी ?

"पापा-मम्मा की तबियत बहुत खराब है देखों न उन्हे क्या हुआ !" देर रात आया रवीश ड्रांईगरूम में ही सो गया था। सुबह रिन्कू ने जगा दिया, 'क्या हुआ रिन्कू ?' " पापा-मम्मा आँखे नहीं खोल रही", " चलो मैं देखता हूँ ", रवीश बडबड़ाता हुआ अपने कमरे की तरफ भागा। जिया की सांसें बहुत धीमें चल रही थी, वह लगभग बेहोश थी !" क्या हुआ रिन्कू तुम्हारी मम्मा को कल तो ठीक थी जब मैं ऑफिस गया था तो कल कुछ हुआ था क्या ?" "पता नहीं मैं तो स्कूल गयी थी, जब वापस आयी तो मम्मा रो रही थी लगता नानी, मौसी-मौसा से झगड़ा हुआ होगा।" "अभी ठीक करता हूँ इन्हे यह ऐसे नहीं मानेगा !" रवीश गुस्से से आग बबूला होते हुए दीपक के कमरे में गया और उसका कॉलर पकड़ घसीटते हुए बाहर लाया, " तू ही है फसाद की जड़ कमीने, लालची अभी दूँगा तुझे जमीन-जायदाद !" गुस्से से रवीश पागल हो रहा था, नीचे लेटा कर दीपक को मारने लगा तभी रिया अपनी माँ को वहाँ ले आयी, जो रवीश को बुरा-भला कहने लगी "तुझे जलन है तभी तो मारने लगा तेरा कोई हक नहीं, इसे मारने का खुद तो शराब पीता है और दूसरों को उपदेश, तू कौन-सा दूध का धुला है, छोड़ इसे !" रिया की नजरों में उसके जीजा को गिराने का मौका दीपक जैसा धूर्त कहाँ छोड़ने वाला था बोला !" हाथ मैं भी उठा सकता हूँ लेकिन मैं तुम्हारी तरह शराबी नहीं !" रिया अपने जीजा के खिलाफ हो गयी, उसे इस तरह दीपक को मारना नागवार गुजरा।

जिया को हास्पिटल में एडमिट कर दिया गया। नन्नू माँ की देखभाल के लिए रूक गया, रिन्कू घर में निक्कू के साथ थी, माँ के अस्पताल जाने से फिर घर बिखरने लगा। रवीश जैसे तैसे काम और परिवार में सन्तुलन बैठा रहे थे लेकिन उनके बस में कुछ न था, वक्त रेत की तरह फिसलता जा रहा था। बूढा ससुर हर पल उनका साथ देता लेकिन सास और साली का रवैया उनके प्रति बहुत बुरा हो चला। चालाक दीपक ने रवीश को सबकी नजरों से गिरा दिया, रवीश को लगने लगा था कि जिया यहाँ से दूर जाने की बात करके कुछ गलत नहीं कहती लेकिन बूढे पिता समान ससुर को वह कैसे समझाये जो उन्हें ही अपना सबकुछ मानते थे। पत्नी से वह दूरी बना चुके थे। वह अपनी छोटी बेटी के साथ अलग अपनी दुनिया बसा चुकी थी। जिया रवीश और उसका खुद का पति उसकी आँखों की किरकिरी बन गये थे। जिसे वह एक पल के लिए भी बरदाश्त नहीं कर पा रही थी, रवीश का दिल टूट भी चुका था।

अस्पताल में जिया का हाथ पकड़े बैठे रवीश की आँखों में आँसू थे। जिया ने अभी तक आँखे नहीं खोली थीं। डॉक्टर का कहना था इन्हे गहरा मानसिक आघात पहुँचा है। शहर से दूर अस्पताल में रवीश का ठिकाना बन गया। बच्चे घर पर अकेले थे, उन्हें डर था दीपक उनके साथ न जाने कैसा सलूक कर रहा होगा। ऑफिस से लगातार छुट्टियाँ हो रही थीं। पता नहीं जिया को इस बार क्या हो गया, रवीश उसे झकझोरने लगे, "जिया उठो जिया, अगर तुमने आँखे नहीं खोली तो मैं हमेंशा के लिए दूर चला जाऊँगा, फिर कभी लौटूँगा भी नहीं।" जिया ने आँखे खोली, उसका स्वर बेहद झीण था," नन्नू, रिन्कू, निक्कू कहाँ है ? नन्नू रिन्कू स्कूल से आ गयी या नहीं !" लगता था उसका मस्तिष्क अभी वहीं था, जब वह अत्याधिक मानसिक दबाव के चलते बेहोश हो गयी थी।" जिया आँखें खोलो मैं हूँ, तुम्हारा राज देखो !"

जिया को होश आ गया नर्स ने एक इन्जेक्शन लगाया, डॉ0 ने कहा, "अब यह थोड़ा ठीक हैं, लेकिन यहाँ बिलकुल भी शोर न हो, न ही इनसे ज्यादा बात की जाये, यदि ऐसा हुआ तो इनकी हालत बिगड़ जायेगी।" " मैं ख्याल रखुगा डॉ0 " रवीश ने कहा।

रवीश बेहद परेशान थे, जिया के पास किसे छोड़ें। कोई ऐसा नहीं था जो ध्यान रखता, जो जिया के अपने थे उन्हीं की वजह से उसका उसकी पत्नी का यह हाल हुआ। रवीश के मन में भी पश्चाताप की ज्वाला धधकने लगी, उन्हें लगा विवाह के बाद उन्होंने जिया के पिता की बात नाहक ही मानी। जिया के घर में नहीं रहना चाहिए था। कम्पनी से घर भी मिला लेकिन ससुर ने कभी जाने ही नहीं दिया। जब वह उनके बेटे बने तो जिया तो बहु ही बन गयी और बहु का हाल सगी माँ-रूपी सास ने क्या कर दिया कि आज उन्हें पछताना पड़ रहा है।

"सॉरी जिया, मैंने तुम्हारा ख्याल नहीं रखा !" रवीश की आँखों से पश्चाताप के आँसू बहने लगे।

"जिया को अस्पताल में कब तक रहना होगा डॉ0 ?"

"अभी इनकी कन्डीशन ठीक नहीं है। बाद मेंं बता देंगे," रवीश ने डॉ0 से पूछा था। ऑफिस से बहुत छुट्टी ले ली अब वह और नहीं देगें क्या करूँ। थोड़ी देर के लिए जाना ही होगा, नन्नू को छोड़ जाता हूँ यहाँ ! रवीश ने नन्नू को सख्त हिदायत दी, माँ का पूरा ख्याल रखना, "ठीक है पापा" नन्नू ने हामी भर दी। चलो अच्छा है स्कूल नहीं जाना पड़ेगा, यहीं अस्पताल में रहूँगा। नन्नू के किशोर मन ने उससे कहा। माँ बिस्तर पर लेटी रहती, नर्स ही दवाई व खाने-पीने का ध्यान रखती। नन्नू अस्पताल के कमरे में सोफे पर लेटा था। नर्स जिया को दवाई दे रही थी, तभी एक लड़की उस कमरे में दाखिल होती है, "वह अभी देखती है तब तक तुम यहाँ रूको !"

वह लड़की वहाँ रूक जाती है। नन्नू की ओर देखती है वह शरमा जाता है। पहली बार किसी लड़की की ओर उसने भी देखा। देखने में साधारण थी, लेकिन चढ़ती उम्र उसे सुंदर बना रही थी, नन्नू उसे एक-टक देखता रहा, कौन है यह शायद उस नर्स की बेटी थी क्योंकि उसने पहली मर्तबा उसे देखा था। तभी उसकी माँ वापस आ गयी, "तुम जाओ मैं शाम को घर जल्दी आ जाऊँगी, सुनो यह कुछ पैसे रख लो।" वह चली गयी नन्नू उसे जाते हुए देखता रहा, वह बोर हो रहा था तो मैगज़ीन पढ़ने लगा। उसमें छपी लड़कियों की तस्वीरों में उस लड़की का चेहरा नजर आने लगा, उसका दिल ज़ोर से धड़कने लगा। यह क्या हो रहा है मुझे, नन्नू को चेहरा शर्म से लाल होने लगा।

घर पर रिन्कू, निक्कू को संभाल नहीं पा रही थी, वह उसे उठा कर नानी व मौसी के पास ले आयी। "मौसी निक्कू को नहला दो बहुत गन्दी हो गयी है, दो दिन से नहायी भी नहीं।"

"ठीक है अभी नहलाती हूँ " कह मौसी निक्कू को रगड़-रगड़ कर नहलाने लगी। छोटी बच्ची की मुलायम त्वचा तोरी के छिलके की रगड़ से जगह-जगह से छिल गयी। रिया अपने होश में नहीं रहती थी, उसकी दीदी अस्पताल भर्ती थी, लेकिन जब से उसके जीजा जी ने दीपक को मारा वह दीपक से कह भी न पायी कि उसे अपनी बड़ी बहन से मिलना था, वह अन्दर से बहुत दुखी रहती। आर्थिक अभाव व उलझते रिश्तों ने उसे भी गमगीन बना दिया, उसका पति एक दम नकारा निकलेगा उसे इसका इल्म न था।

रवीश घर पर पहुँचे तो निक्कू को गोद में उठाया। निक्कू की रगड़ी हुई त्वचा देख वह परेशान हो गये, रिन्कू को खुब फटकार लगाई,उन्होंने, वह उसे खुद ही नहला देगे कोई जरूरत नहीं मौसी को कहने की। घर और ऑफिस के काम निपटा कर जब रवीश वापस पत्नी के पास अस्पताल पहुँचे तो जिया और नन्नू सो रहे थे। तुमने नन्नू को खाना लाकर दिया। उनको परेशान देख जिया की देखभाल कर रही नर्स ने बोला कि वह चाहे तो उनकी बेटी उनके घर के काम और छोटी बच्ची को सँभालने का काम कर लेगी, जो ठीक समझना दे देना। इन परेशानियों को देखते हुए रवीश ने उस नर्स की बात मान ली, और नन्नू को बोला उनकी बेटी को कल उसके घर से ले आना, नन्नू खुश हो गया।

जब से अस्पताल की नर्स की बेटी को नन्नू घर लेकर आया कोशिश करता घर रहने की, अपने पापा को मना कर देता बहाने बना कर, निक्कू अकेले रहती है और रिन्कू उसे नहीं संभाल पाती। रवीश भी कुछ न बोलते, पत्नी की चिन्ता में यह ध्यान न रहा, उनका किशोर बेटा चंचल हो चला था, वह निक्कू का बड़ा भाई कम पापा ज्यादा बनने लगा। जब से रीतिका उसके घर में थी, वह कुछ ज्यादा ही जिम्मेदार बन गया।

नानी, मौसा व मौसी यह देख मन ही मन मुस्कुराते।

रीतिका घर के सारे काम करने लगी। जब उसका मन करता नन्नू उसे उसके घर लाता, ले जाता।

एक दिन जिया की तबियत कुछ संभली तो रवीश ने कहा, वह थोड़ी देर के लिए ऑफिस हो आते हैं, जिया की आँख भर आयी, "तुम्हें मुझसे ज्यादी नौकरी की पड़ी है।"

रवीश ने जिया की हालत देख कहा तुम नहीं चाहती तो नहीं जाऊँगा नौकरी करने, यही रहूँगा, तुम्हारे पास। थका हारा रवीश जिया के बेड पर ही सर रख के सो गया। जिया ने भी अपनी आँखे बन्द कर ली, तभी नन्नू खाना ले आया। खाना दे कर तुंरत वापस जाने लगा तो रवीश ने पछा, कहाँ की जल्दी है ? " पापा मुझे रितिका को उसके घर से लेकर आना है, वहाँ निक्कू अकेले है।"

'ठीक है तुम जाओं।'

उन्हें जो दिख रहा था नन्नू की आँखों में उससे वह चिन्तित हो गये। रवीश जिया को बोलते है, "जिया तुम जल्दी ठीक हो जाओ, बच्चे अकेले हैं, वहाँ कोई उनका ध्यान नहीं रखेगा।" जिया चुपचाप निढाल थी, उसकी सांसे तो चल रही थीं, लेकिन यूँ लगता था मानो जिस्म में जान ही न हो। रवीश जिया का हाल देख मन ही मन रो रहे थे, वह अपनी पीड़ा को दबाते रहे।

तभी कमरे में डॉक्टर विजिट के लिए आये, रवीश को कुछ कहा उसके बाद रवीश घर पहुँचे, "मम्मा के पास कौन-कौन जायेगा, रिन्कू रिन्कू ! वह दौड़ती हुई आयी, "क्या हुआ पापा मम्मा कैसी हैं !" तुम चलोगे मम्मी के पास, चलो तैयार हो जाओ।

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