Audio

Forum

Read

Contests

Language


Write

Sign in
Wohoo!,
Dear user,
मन
मन
★★★★★

© Amresh Singh

Abstract

1 Minutes   12.8K    5


Content Ranking

मन मार के जीते हैं

जीवन से हारे लोग

क्या-क्या नहीं सहते 

हैं ये बेचारे लोग


बचपन जिनका खेला 

हो माटी के खिलौने

क्या जाने वो कैसे 

होते मखमली बिछौने, 

चादर घटती जाये 

कैसे पैर पसारे लोग

मन मार के जीते हैं

जीवन से हारे लोग। 


डूब गये कितनो के सूरज 

शाम ढलने से पहले

बिन जागे ही टूट गये 

सपने जो रहे सुनहले,

कौन बने अंधे की लाठी 

बिना सहारे लोग

मन मार के जीते हैं

जीवन से हारे लोग।


जीवन पथ पर करना 

पड़ता अथक परिश्रम

मेहनत पूरी-पूरी रहती 

मज़दूरी फिर भी कम, 

सुने खरी खोटी 

रोटी हित दुखियारे लोग

मन मार के जीते हैं

जीवन से हारे लोग।


दूसरे की शर्तों पर ही 

जिनका जीवन चलता

विस्तार भला कैसे तब 

निज इच्छा को मिलता, 

मन की मन में रखते हैं

रहते मन मारे लोग

मन मार के जीते हैं  

जीवन से हारे लोग। 


जीवन लोग शर्त

Rate the content


Originality
Flow
Language
Cover design

Comments

Post

Some text some message..