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ज़मीन और जमनालाल (तीन)
ज़मीन और जमनालाल (तीन)
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© Om Nagar

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तमाम कोशिशों के बावजूद 
जमनालाल
खेत की मेड़ से नहीं हुआ टस से मस
सिक्कों की खनक से नहीं खुले
उसके जूने ज़हन के दरीचे।

दूर से आ रही 
बंदूकों की आवाजों में खो गई
उसकी आखिरी चीख
पैरों को दोनों हाथों से बांधे हुए
रह गया दुहरा का दुहरा।

एक दिन लाल-नीली बत्तियों का 
हुजूम भी लौट गया एक के बाद एक
राजधानी की ओर
दीवारों के सहारे टंगे बल्ब हो गये फ्यूज़।

इधर राजमार्ग पर दौड़ते 
वाहनों की चिल्ल-पो
चकाचौंध में गुम हो जाने को तैयार खड़े थे
भट्टा-पारसौल, टप्पन, नंदी ग्राम, सींगूर।

और न जाने कितने गांवों के जमनालालों को
रह जाना है अभी
खेतों की मेड़ों पर दुहरा का दुहरा।

#poetry #hindipoetry

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