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इंसान
इंसान
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© Nilabh Singh

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उसके लिये जीना फिर से आसान हो गया
खुदा बना फिरता था, अब इंसान हो गया।
 
इस शहर में रहते थे अमीर या गरीब
अब कोई हिंदू या फिर मुसलमान हो गया।
 
इतनी ऊँची दीवारें, उसकी कोठी ढँक गयी
उसका घर होगा, हमारा आसमान हो गया।
 
ख्वाहिशों का वजन ये शहर ढो नहीं पाता
यहाँ का हर मोहल्ला सुनसान हो गया।
 
कितने अरमान कितने राज दफन होंगे
कमबख्त दिल न हुआ, कब्रिस्तान हो गया।
 
न जाने किस डर से लोग भीड़ बन गये
क्यूँ इतना खौफजदा हिंदुस्तान हो गया।

खुदा भीड़

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