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    मैं देवी की छाया
मैं देवी की छाया
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© Srivats Anshumaali

Comedy

2 Minutes   6.9K    5


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पिता ने कभी न अपनाया ।
उनके रहते ,मेरा चेहरा हमेशा मुरझाया ॥
ना जाने क्यों ?
बहुत रोना आया ,
जब उठ गया उनका साया ॥
मेरी राम की नहीं ,
सीता की है काया ,
शायद इसलिए पिता का
प्यार ना मिल पाया ।
यह ज़माना मुझे समझ नहीं पाया ॥
ज़माने ने प्यार से समझाया ,
तू अकेले कुछ ना कर पाएगी ।
इस दुनिया से नहीं लड़ पाएगी ।
हमारे पैरों तले तू मर जायेगी ।
मैं दुर्गा की हूँ छाया ,
मैं हूँ कमज़ोर और निर्बल,
यह ज़माने ने समझाया ॥
किताब छीन कर चूल्हा पकड़ाया ।
इसी चूल्हे ने ,
पढाई का सपना जलाया ।
पुस्तक का बस्ता हटाया ।
ज़िम्मेदारी का बोझ,
इन्ही कंधों पर आया ।
मैं थी सरस्वती की छाया ,
दुनिया ने अनपढ़ रहना सिखाया ॥
बहु को बेटी नहीं ।
कमाने का ज़रिया बनाया ।
वह थी तो लक्ष्मी की काया ,
पर लक्ष्मी का वही पहलु ,
समाज समझ पाया
जो उसे पसंद आया ॥
दुनिया ने ,दया भाव दिखाया ।
हर पल सताया ॥
हमें 'निर्भया ' बताया ,
हमें 'निर्भया' बनाया ।
स्त्री थी काली की छाया ,
लाचारी की कालिख ,
सबने उसी पर पुतवाया ॥
मुझे अब पढ़ना है ,
सशख्त बनना है ,
घुट -घुट कर नहीं मरना है ।
इस दुनिया से लड़ना है ।
अपने लिए कुछ करना है ॥
एक दिन दुनिया मुझे पहचानेगी ।
मुझे ,मेरे ही नाम से जानेगी ॥
अपना मान -सम्मान मैं लड़ कर लूंगी ।
उदर के लिए नहीं ,
आदर के लिए कुछ करूँगी॥
इस ज़माने से आगे बढ़ूंगी ।
इतनी देवियों की छाया हूँ ,
ऐसे तो नहीं मरूँगी।

नारी विडंबना

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