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औरत की जात -
औरत की जात -
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© Meera Srivastava

Inspirational

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न औकात न बिसात 

औरत की जात 

न औकात न बिसात ,

घर की न घाट की 

पलड़े पर चढ़ी बँदर बाँट सी ,

सूरज कब निकला और कब डूबा  

उतरी चाँदनी कब उसके आँगन 

तारे चमके कब आसमान पर ,

चूल्हे से बँधी , चूल्हे से लगी 

उपले - राख , लकड़ी - काठी 

अकूत सम्पदा की स्वामिनी 

घर की लक्ष्मी , लक्ष्मी से छूछी 

हिसाब न किताब  

काम ही काम ,

कविता न कहानी ,

न दोहा - चौपाई 

टूटते तन को , हारे मन को

ढले रात झिलंगी चारपाई 

चौका - भंडार में बरकत जिससे 

अन्नपूर्णा के नाम आखिरी जली रोटी 

न भाजी न साग ,

धुआँती आँखों से गिरते पानी से गटकती कंठ में 

अटकी रोटी ,

ऊँघता घर - आँगन बुहार ,

दिया जला चूल्हे को आँच  

आग जलाना , रोज यही किस्सा दोहराना ,

चूल्हे संग हर एक सुबह ,

चूल्हे संग उसकी हर रात 

पूरब से पश्चिम चलकर सूरज कब उतरा तलैया के पार ,

अन्नपूर्णा गृहिणी को तो बस चूल्हे से ही काम ,

ताम - झाम चूल्हे के सारे 

किससे बाँटे मन की बात ?

औरत की जात - न औकात , न बिसात .....

औरत चुल्हा घर अन्नपूर्णा रात-दिन जीवन

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