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 चिड़ियाँ चीडीयाँ
चिड़ियाँ चीडीयाँ
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© Raman Sharma

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   चिड़ियाँ
बर्षों बाद चिड़ियाँ देखने को मिली,
मधुर चह चहाहट सुनने को मिली ,
बैठ गईं आँगन में आकर कहीं से,
मन को मनो तसल्ली मिल गई !
रहने लगी घोंसला बनाकर  किसी कोने में
धीरे-ध्रीरे घर का हिस्सा बन गई ,
यूँ हीं अचानक, ना जाने कहाँ उड़ गई
और मन में छोड़ के यादें  चली गईं I
आँगन में उसके लिए दाने डाले थे मैंने

चैन  से भरपेट खाये थे उसने I ,
फिर यूँ ही  अचानक वो  उड़ने लगी
पंख फर फरा के चहचहाने लगीं ,
दाना उठाकर चोंच से अपनी ,
अपने बच्चों को प्यार से खिलने लगी,
किनारे पर जमें  हुये पानी भी उसने
चोंच से भरकर बच्चों को पिलाने लगीं I

मस्ती में फिर,  वो यहां- वहाँ बैठी ,
फिर अचानक से नभ को वो  उड़ चली  ,

 लौट के न आईं अभी तक को  चिड़ियाँ,
ना जाने कहाँ उड़ वो गईं चिड़ियाँ I

 

 

बर्षों बाद चीडीयाँ देखने को मिली
मधुर चह चहाअट सुनने को मिली ,
बैठ गईं आँगन में आकर कहीं से
जैसे मानो मन को तस्सली मिल गई ,
रहती थीं घोंसला बनाकर कोने में
घर का एक हिस्सा बन चुकी थीं ,
पर यूँ अचानक ना जाने कहाँ उड़ गई

और मन में यादेँ छोड़ के चली गईं ,
बैठ गईं आँगन में आकर कहीं से
जैसे मानो मन को तस्सली मिल गई ,
चोग में दाने डाले उनको मैनें
आराम से भरपेट खाये उन्होंने ,
फिर यूँ अचानक उड़ने लगी
झूम झूम के चहचहाने लगीं ,
चोंच से दाना उठाकर अपने
बच्चों की चोंच में डालने लगीं ,
किनारे पर जमा हुये पानी को
चोंच मेँ पानी भरकर पीने लगीं
और बच्चों की चोंच में डालने लगीँ ,
फिर यहां बैठी,वहाँ बैठी खूब मस्ती की
फिर अचानक आसमान में उड़ गईं ,
अभी तक लौट के नहीं आईं चीडीयाँ
ना जाने कहाँ उड़ के चली गईं चीडीयाँ,

raman sharma

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