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सच और झूठ का भेद
सच और झूठ का भेद
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© Shailaja Bhattad

Inspirational

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वो क्या मजबूरी होती है,

जो सच्चाई को गहराई तक

नापने के बाद भी मुँह पर ताले लगा देती है ।

हर पूरी होती कहानी को मंझधार में ही

छोड़कर किनारा कर लेती है ।


झूठ की परत मोटी ज़रूर होती है ।

उसकी तहें खोलते खोलते सदियाँ

ज़रूर बीत जाती है ।

लेकिन एक दिन खुलती ज़रूर है ।

फिर सच इतना मजबूत हो जाता है कि

झूठ के लिए उसे भेदना नामुमकिन हो जाता है ।

बस यहीं से सतयुग शुरू होता है ।

गहराई सतयुग मजबूत

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