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रंग
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© दयाल शरण

Drama

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अब तो मैं भी हार गया हूँ

पुराने रंग को ताजा करते-करते

बहुत रफू है लिबास में उनको

नाकामी से ढका करते-करते।


कूंचियाँ लाख सतरँगी करे

कैनवास की रंगत

थक गया हूँ बेअदब अनछुपे

किरदारों से किनारा करते-करते।


है रिवायत कि मौत तक

निभाइये क्यूँकि ये रिश्ते हैं

बड़े बेशर्म हैं बेपर्दा हुए जाते हैं

जिंदगी का सफर करते-करते।


यह रंजिश बड़ी बेदर्द है

इतनी की उसे पता ही नहीं

मेरी आँखों मे अश्क उसके हैं

झर रहें हैं शिकवा-गिला करते-करते।


ख्वाब का क्या है कभी

बड़े हसीन से दिख जाते हैं

जिंदगी कट जाती है

रूह को जिस्म में घर करते-करते।

रंग जीवन इंसान शरीर रूह

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