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राख
राख
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© Nitin Yadav

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जिन बर्तनों पर उसका नाम उकेरा था
बर्तन वाले ने कभी
वे बर्तन कभी मुस्कुराते और चमकते थे भरी रात में
अब वे रोज़ राख से धुल कर सूखते है अंधेरे कोने में
घिसते बर्तनों के साथ उसका नाम भी घुल गया है राख में
कुछ बर्तन जिन पर उस का नाम मिट गया था
वे टूट कर उससे बिछड़ गए हमेशा के लिए
जबकी उसका टूटा हिस्सा बह गया है राख के साथ
बर्तन धोते-धोते
जब बर्तन पूरी तरह घिस जाएंगे तो
खुरदुरे हाथो में बच़ जाएगी एक मुठ्ठी राख
वह राख जिसमें घुल गया उसका नाम
उसी राख से वह जोड़ती है खुद से खुद को
ढूंढती है ज़िन्दगी के कुछ कण
जिससे वह बर्तनों को नहीं खुद को रगड़ती है
और सुखाती है अपनी हड्डियों की रस्सी पर
तन्हा हवा में
उदास धूप के साथ
अंजुली भर आसमान की चाह में
फिर से खुद को मिटा कर
एक कतरा ज़िन्दगी की तलाश में

स्त्री के जीवन की संवेदना

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