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कुछ लोग मेरी जमात का पता
कुछ लोग मेरी जमात का पता
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© Harendra Singh Kushwah Aihsas

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कुछ लोग मेरी ज़मात का पता पूछते हैं |

मै क्यों बैठा हूँ वर्षों से लापता पूछते हैं ||

निर्लज्ज महाभारत की इस ध्रुत क्रीड़ा में |

निसाह निर्बल झुलस रहा बिदुर पीड़ा मे ||

शकुनि से सब कपटी भीष्म द्रोण को घेरे |

द्रौपदी लुट रही लगे है दरवाज़े पर पहरे ||

अजी द्वापर की बात छोड़ो यह कलयुग है |

यहाँ कृष्ण भी तो बचाने की वजह पूछते हैं ||

कुछ लोग मेरी ज़मात का पता पूछते हैं |

दिल्ली के गलियारों मे औरत लज्जाहीन हुई |

धरती से अम्बर तक मानवता की तौहीन हुई ||

कुछ अप्सरायें भी अपनी सीमाऐं लाँघ रही हैं  |

आधुनिकता मे र्निवस्त्र अधिकतर जाँघ रही हैं  ||

अजी नहीं लिखी जाती दस्ताने हिन्द हमसे |

कुछ लोग तो समाज की ख़ता पूछते हैं ||

कुछ लोग मेरी ज़मात का पता पूछते हैं | 

 

कविता गज़ल हरेन्द्र कुशवाह लोग

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