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© Kapil Jain

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••••• क्षणिकाऐं •••••••

 1)

 कागज़ जब मुझे रजिस्टर में से कागज़ फाड़ना होता है मैं हाशिये को मोड़कर फाड़ लेता हूँ वरना उससे जुड़ा बहुत आगे का पन्ना भी फट जाता है भविष्य है क्यूँ फाड़ूँ अपने ही हाथों.... 

2) 

बीच की दराज़ यह हमेशा फँसी रहती है ऊपर वाली और नीचे वाली को तीन चार बार खोलना पड़ता है तब जाकर बीच वाली दराज़ खुलती है बीच की चीज़ कभी अच्छी नहीं होती...

 3) 

टेलीफोन तार का स्प्रिंग एक बार उल्टा घूम जाए तो सीधा नहीं होता चाहे रिसीवर को घुमाओ या फिर तार के बलों को एक न एक बल रह ही जाता है रिश्तों की तरह... 

4) 

जमीन पर फैलती बेल सुघड़ और हरी भरी होती है आकाश की तरफ़ बढ़ती बेल को अक्सर सहारे की जरुरत पड़ती है सुंदर सुघड़ और आत्मनिर्भर जीवन के लिए ज़रुरी है जमीन से जुड़ाव.... 

5) 

बिजली के सारे स्विच चेक कर लिए गए हैं सब पर ओके लिख दिया गया है जिम्मेदारी से मुक्ति ज़िन्दगी पर क्या कभी ओके लिखा जा सकता है... 

6)

 जब भी दिन का अंत होता है मैं रजिस्टर में एक रेखा के बीच में क्रॉस लगाता हूँ मुझे पता नहीं चलता आदतें कब हमारी पहचान बन जाती हैं पता नहीं

 7)

 महीना बदलते समय धागा आगे करना पड़ता है कागज़ थोडा सा फट जाता है धागा छोटा होता जाता है ज़िन्दगी की तरह 

8) 

धूप बत्ती अक्सर आधी जलकर बुझ जाती है पूरी जले उसके लिए जरुरी है कि उसका सिरा पूरी तरह से आग पकडे उसे उल्टा कर के किनारे से जलाना पड़ता है जब तक पूरी तरह से लौ नहीं पकड़े उल्टा ही पकड़े रहना पड़ता है फिर सीधा करके हाथ से हवा करनी होती है तब वह पूरी नीचे तक जलती रहती है जन्म से लेकर मृत्यु तक 

कपिल जैन..

जिन्दगी

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