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ख़तरा-ए-हुक्म सरकार
ख़तरा-ए-हुक्म सरकार
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© Rajkumar Kumbhaj

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मैंने छूकर देखा

पानी और ख़ुशबू को , वे अब भी पवित्र थे पूर्ववत

पवित्रता क़ायम-मुक़ाम थी अब भी शब्दों की

किन्तु फिर भी मुस्कुरा रहे थे बुद्ध

बुद्ध का मुस्कुराना तय कर रहा था बहुत कुछ

जैसे यही कि रंग-बिरंगी पतंगें उड़ती रहेंगी पूर्ववत

या कि फिर तितलियों तक को

उड़ान भरने से पहले लेना होगा पासपोर्ट

ख़तरा-ए-हुक्म सरकार तामील करो

कितना पास ? कितना पास ?

कितना दूर ?

ख़तरा - ए - हुक्म सरकार

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