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माँ ! सपने पकाती है ; उम्मीद की आँच पर
माँ ! सपने पकाती है ; उम्मीद की आँच पर
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© Anupam Tripathi

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माँ ! सपने पकाती है ; उम्मीद की आँच पर


 

1

एक निवेदन *********
हे ; प्रभु !
मुझे इतने बलिष्ठ पंख ना देना
ताकि ; अनन्त ऊँचाईयों तक उड़ूँ
आकाश की हदों को छू लूँ *******
अपना आधार ही खो दूँ ********
हे ; प्रभु !
कभी इतना भी न गिरूँ , कि ;
स्वयं की परछाई से भी लघु लगूँ .
**************अनुपम त्रिपाठी 

2
माँ -----
माँ ! सपने पकाती है ; उम्मीद की आँच पर
मजबूरी की सीली लकड़ियाँ
उगलती हैं ---- अभावों का धुँआ
अश्रुपूरित हुआ सारा घर
फिर भी ; ज़रुरत का चूल्हा
---------------------स्नेह की फूँक से
बार----बार जलाती है ------------
माँ ! सपने पकाती है -------------

पकी --अधपकी रोटियाँ
खाते है ; सब चाव से
घुली है उनमें-विश्वास की महक
घर को देती हुई : आश्वासन
खाली कनस्तर में अमूमन
-----------------कंकर बजाती है
माँ ! सपने पकाती है--------------

बच्चे जब रोते हैं ---------
शोख रंगों के लिऐ ;
मिठाई-- पतंगों के लिऐ
----फीकी मुस्कान ओढ़े ----------
कर्ज़------ लाती -----है
मीठी लोरी सुनाती है
माँ ! सपने पकाती है-------

कल ; बड़े होंगे : बच्चे
माँ की उम्मीदें -- माँ के सपने
--------------- जुटा लेंगे साधन
--------------- ख़ुशियों के मौसम

लगेगी यही माँ ; बोझ - सी उनको
पलकों में पाला -- पुतली सा जिनको
अपनी उपेक्षा पे आँसू बहाती है

माँ ! सपने पकाती है***************
+++++++++++++++++++++++//+

ANUPAM TRIPATHI POEM HINDI MOTHER MAA

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