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शिक्षा बनी व्यापार
शिक्षा बनी व्यापार
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© Mani Aggarwal

Drama

1 Minutes   359    10


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व्यवसाय अब हो गया,

 शिक्षा का आधार।

अभिभावक सब झेल रहे,

इसकी भारी मार।


सुरसा मुख सी बढ़ रहीं,

स्कूलों की फीस। 

भर-भर कर बेहाल जनक,

हृदय में उठती टीस।


बिना पढ़ों का दौर अब, 

रहा नहीं है भाई।

पर जी का जंजाल हुई,

बच्चों की पढ़ाई।


खून-पसीना एक कर,

जोड़ें पाई-पाई।

स्कूलों के पेट में,

सारी गई समाई।


भारी पहले न लगती थी,

 दस बच्चो की पढ़ाई।

दो बच्चों की शिक्षा नें अब,

माँ-बाप की नींद उड़ाई।


काश ! योजना ऐसी कोई,

ले आए सरकार।

तालों में अब बंद हो,

स्कूली व्यापार।

शिक्षा नींद जंजाल

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