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बारिश की एक शाम
बारिश की एक शाम
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© Kapil Jain

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याद है तुम्हें
बारिश की वो शाम
हाथ में तेरे
थी मेरी भी हथेली
काँधे पे टिका
वो मासूम चेहरा
भीगा हुआ तिल था
मैं भी भीगा-भीगा-सा
ओर भीगी भीगी तुम
मन भी पनियारा
ख़ामोश तुम
बारिश की बूँदों को
सुनती हुई
जैसे पाज़ेब कोई
तेरी हँसी-सी
छनकती हो कहीं
मैं भी ख़ामोश
सुमधुर संगीत
सुनता रहा
सतरंगी कंगन
तेरे हाथ में
जिसे लिया था तूने
ज़िद करके
सावन के मेले से
वो नीली झीनी सी ड्रेस
जो पसन्द थी तुम्हें
मैं चाहता था
ख़रीदवा दूँ तुम्हें
जानता था मैं
परी लगोगी तुम
पहन उसे
तेरी नज़रें चुरा
झाँकी थी जेबें;
उसे पहन तुम
इतराई थी
चिड़िया-सी चहकी,
हिचकिचाई;
मैं मुस्करा के बोला,
तुम्हे पसंद है, ले ली
संतुष्ट हुई तुम
धीमे से बोली
हाथ थाम के मेरा
जो पैसे बचे
चलो दावत खाऐं
मैं मुस्कराया
कैसे कह देता मैं
तुम्हारी हँसी
मेरी खाली जेबों में
खनक रही;
बीत गऐ बरसों
पर आज भी
जेब में तेरी हँसी
खनक ही जाती

बारिश की एक शाम

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