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माँ
माँ
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© Avdhesh Dadhich

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कोई सजदा पढ़ आया है चुपके से मंदिर में।
हिचकियां बहुत आयी हैं आज कलेजे में मेरे।।

जरूर आज उसने अपने दामन को दस बार छुआ है।
माथे पे बेजान सी सिहरन दौड़ उठी है मेरे।।

बेशकीमती नवाजिशें वो मुफ़्त में दे देती है मुझे।
माँ जो है ना मेरी, ख़्वाब बुनती है मेरे।।

उसका बस चले तो चाँद तारे तोड़ लाये फ़लक़ से।
बहुत कड़क बनने वाली माँ, पीछे से रो देती है मेरे।।

रवायतें तो ख़ूब बना रखी हैं ज़माने ने अवधेश।
पर फ़रिश्ते पे भी भारी रहबर, माँ साथ है मेरे।।

 

माँ

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