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मौन
मौन
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© Suryakant Tripathi Nirala

Classics

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बैठ लें कुछ देर,

आओ,एक पथ के पथिक-से

प्रिय, अंत और अनन्त के,

तम-गहन-जीवन घेर।

मौन मधु हो जाए

भाषा मूकता की आड़ में,

मन सरलता की बाढ़ में,

जल-बिन्दु सा बह जाए।

सरल अति स्वच्छ्न्द

जीवन, प्रात के लघुपात से,

उत्थान-पतनाघात से

रह जाए चुप,निर्द्वन्द ।

सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला मौन उत्कृष्ट रचना

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