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शमा
शमा
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© Anantram Choubey

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शमा की लौ

जलती है

रोशनी के लिये

बस जलती है

अँधेरों को दूर

करने के लिये

कोई जल जाये

उसका कुसूर क्या है

क्यों परवाना

उस शमा की

लौ से जलता है

क्यों इस तरह

प्यार में पागल

बना रहता है

अँधेरों से डरता है

शमा की रोशनी से

क्यों जलता है

ये उसकी आदत है

जलने की फितरत है

ये कैसी उलफत है

जो जलकर भी

जला करती है

बस पागलपन है

शमा को फिर क्यों

बदनाम करता है

शमा तो जल के

भी रोशनी देती है

अपना त्याग

बलिदान करती है

कष्टों को सहती है

भँवरों की तो ये

फितरत होती है

खुद जलते हैं

बदनाम शमा

होती है।

 

 

कविता

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