Kanchan Jharkhande

Abstract


Kanchan Jharkhande

Abstract


ग्रामीण स्त्रियाँ

ग्रामीण स्त्रियाँ

1 min 379 1 min 379

मुझे प्रेम करना नहीं आता

मैं निर्जीव जीव हूँ

मुझें आदेश दिए जाते हैं

मैं केवल निभाती हूँ उन्हें


मुझे अधिकार नही की 

मैं खुद से प्रेम करूँ

कुछ गलत कहा मैंने

नहीं-नहीं 

शायद कोई कठपुतली हूँ मैं


कठपुतली ही तो हूँ 

बर्तनों की गूंज में 

आवाज़ मेरी विलीन हो चुकी

करवटों की मोड़ में

परवाह की आह है


कभी सोचा है, 

उन स्त्रियों के बारे में

जिनके जीवन मे नवीनतम

आवरण विलुप्त है


वे शायद चूल्हों के धुओं में

धुंधली सी पड़ चुकी हैं

वे अपने गांव और जंगल से

कभी मुक्त नहीं हुई

लकड़ियों को ढोते-ढोते


लकड़ी सी हो चुकी हैं

एक कुआँ खेत में है 

पानी खीचने के लिए

एक कुआँ आँखों तले 

रखे बैठी है, 


आँसुओं के मोती भरने के लिये

पर न जाने कहाँ से फिर भी

उनके अंतर्मन में 

साहस की ज्वाला जलती रहती

वे तनिक भी नही थकती 


वे कड़ी धूप में जूती जाती हैं

खेत मे फसलों की कटान के लिए

फिर भी थकान की उफ्फ तक

नहीं करती।

 

वे स्त्रियाँ जो शहर से अज्ञात हैं

वे स्त्रियाँ जो ग्रामीण हो गई।


Rate this content
Originality
Flow
Language
Cover Design