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धर्म (मज़हब) बड़ा या इंसान
धर्म (मज़हब) बड़ा या इंसान
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© Pranjal Vyas

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बता दिया उस रब ने कि है क्या तेरी औक़ात इंसाँ, 

हिन्दू, मुस्लिम बाँटा तुमने मैंने भेजी ज़ात इंसाँ । 

जान सको तो जानो जाके मरने वालों में है कौन,

कहर से बचने के लिए संग रहने वालों में है कौन । 

कहाँ गये वो हिन्दू और कहाँ गये सब काज़ी मुल्ला,

बता सके जो चेन्नई में कि सुरेश मरा या अब्दुल्ला । 

कहाँ गये वो राम-भक्त और कहाँ गये वो टोपीदार ,

 कहाँ गये वो कट्टरपंथी और धरम के चौकीदार । 

अपनी जाति अपना मज़हब अपना सबकुछ जपते । 

अपनी मस्ज़िद अपना मन्दिर अपना ही घर कहते ।

क़ुदरत से दिखलाओ लड़ के कितनी तुम में ताक़त है । 

पूछो ताल ठोक गगन से क्यों कर दी ये हरक़त है ।

वो चाहे धरती सब सून वो चाहे जग सारा सून ।

फिर क्या पाने को कहते हो ये मेरा ये मेरा ख़ून ।

देख अनदेखा करते क्यों आखिर रंग तुम एक समान ।

ईश्वर अल्लाह एक है तो नफ़रत क्यों मन में विद्यमान। 

उठो चलो अब ख़त्म करो ये तेरी मेरी बातें सब ।

जिन्हें ज़रूरत आन पड़ी है मिल के दो सौग़ातें सब । 

कवि प्रांजल व्यास

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