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अपरिमित बंधक
अपरिमित बंधक
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© Arti Tiwari

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स्त्री ,, लोचमयी/लावण्यमयी

गहने लकदक/नई गढ़न के

पहने नख से शिख तक

रेशमी परिधान/जगमग जगमग

ऊपर से नीचे तक

सब

ब्रांडेड ब्रांडेड

.....

मिलती सबसे मुस्कुरा के

ऊग आते /कुछ सवाल

स्त्रियां देख देख व्याकुल डाह से

पुरुष देखते/हसरत भरी निगाह से

भ्रमजाल में/उलझी 

अपने होने को लेके

आखिर क्या हूँ मैं

?

क्या वो सीता ,जो त्यागी गई राम के द्वारा

या शापित अहिल्या /पत्थर की शिला

जो धन्य हुई राम द्वारा 

या द्रौपदी जो /लगाई गई डौन दांव पे

.....

क्योंकि ख़त्म होते ही महफ़िल

मैं क़ैद होने वाली हूँ/फिर से

उसी पिंजरे में/ जिसे नाम तो घर का मिला है पर

.घुटता है दम/हरदम 

उस पिंजरे में

जहाँ लगें हैं/सीसी टीवी कैमरे

जो बेधते /साँस साँस

उठना बैठना हंसना बोलना

उस पिंजरे में

इतना भी नही विस्तार/के

फड़फड़ा सकूँ पंख

स्त्री पुरुष भ्रमजाल

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