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नाचते हो जिन बारिशों में तुम
नाचते हो जिन बारिशों में तुम
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© Mrinaal Prem Swarroop Srivastava

Inspirational Comedy

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नाचते हो जिन बारिशों में तुम

नीड़ जाने कितने घुल जाते हैं

अलाव हो सेंकते जिन अंगारों का

जाने कितने घरौंदे स्वाहा कर आते हैं

 

 

दम घोंट रहे एसी तुम्हारे

रही उन सदियों के

जी रहे कर तुम नाला

जल-बिंदु जिनकी नदियों के

 

 

तृषा शांत होती तुम्हारी

उदरस्थ कर यद्यपि विश्व समूचा

जाओगे अरे दो गज़ ज़मीं के ही नीचे

मरण-स्थल हो चाहे जितना ऊँचा

 

हँस हँसियाँ नकली भला

तुम किसे बरगला रहे हो

ज़रा पूछना आईने से कभी

 

हमें बना रहे हो- या खुद को झुठला रहे हो?? 

प्रकृति बारिशें नदियाँ स्वार्थ

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