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भूल जाता हूँ....
भूल जाता हूँ....
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© Sanjay Maurya

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नया फिर जख़्म खाता हूँ पुराना भूल जाता हूँ,
बरसते फिर रहे आँसू छिपाना भूल जाता हूँ....

भटकता ही रहा जो दोस्त मैं वो ही परिंदा हूँ,
बता कर राह मैं ख़ुद का ठिकाना भूल जाता हूँ....

यहाँ अब प्यार की रस्में बड़ी उलझी सी होती हैं,
समझ पाता नहीं उनको निभाना भूल जाता हूँ....

तुझी को सोच कर अक्सर गिरे हैं आँख से मोती,
मगर यह भी हुआ अक्सर गिराना भूल जाता हूँ....

गरीबों की हवेली को ख़ुदा निकला सजाने फिर,
महल फिर देख मिट्टी का सजाना भूल जाता हूँ...

उसी की याद में "संजू" सिमट कर रह गया हूँ मैं,
मुझे बस मौत अब दे दे कि जीना भूल जाता हूँ....

 

ग़ज़ल...

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