Kanchan Jharkhande

Abstract


Kanchan Jharkhande

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ये मुस्कुराने की आदत

ये मुस्कुराने की आदत

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हम खामोश थे

तुम भी खामोश थे

ये मुस्कुराने की आदत सी


क्या हो गई

हवा का रुख अब 

ये क्या हो गया

वो शर्मोहया 


अब अदा हो गई

वो बेख़बर ऐ सौंदर्य 

वो मासूम ऐ बगुल

वो लूटा के चमन


गुलिस्तां हो गई

तेरी सख्त ऐ अदा

तेरी बेरुख बयां

क्या कहूँ के अब


जिगर ऐ फिदा हो गई

वो पतझड़ बसंत

वो राग ऐ रिदम


वो मासूमियत मेरी 

न जाने कहाँ खो गई

तुम जो आधुनिक हुए


तुम जो निखर गये

तो क्या तुम्हारी वो

अंदाज ऐ अदा भी 


दरबदर,

यहाँ-वहाँ हो गई ?

तेरी तीर ऐ नजर 

मेरा कातिल जिगर


तेरी पलटने की अदा

रुखसार ऐ खतावार हो गई

मेरी मोहब्बत ऐ मासूम

हरफे खफ़ा,


हर दफ़ा तुझ पर

निशार हो गई।


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