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ज़हर का घूँट
ज़हर का घूँट
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© Kamlesh Malik

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मैंने बहुत पिया है

ज़हर का घूँट

बचपन से आज तक हुई है

मेरे एक-एक सपने की लूट

अरे, सपने देखने का तो

सबको हक़ है

इसमें कौन सा

शक़ है ?

सब देखते हैं सपने

सपने ही तो भरते हैं

जीवन में रंग

किन्तु…..

मेरे सपने

कभी नहीं हुऐ मेरे अपने

ज़हर की घूँट पीते-पीते

लगता है

मैं ही जहरीली हो गई हूँ

या यह वातावरण ही

ज़हरमय हो गया है

यह झूठ हो या सच

पर यह तो निश्चित है

कि कहींं भी अमृत नहीं रहा

तभी तो

सर्प कहता है

मानव मुझसे ज़हरीला है

काँटोंं से भी कटीला है

लगता है कोमलता नष्ट हो गई है

या फिर लम्पटता के

बोझ तले खो गई है।

ज़हर का घूँट

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