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धुआँ
धुआँ
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© Pratik Phadkule

Drama Fantasy

1 Minutes   13.9K    11


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सुनहरी सुबह की आस में,

बहुत रातें मैंने जागते हुए काटी !


हर बार सुनहरी सुबह नहीं,

लेकिन मुझे दिखा,

धुआँ निकलता हुआ,

मेरा सारा आसमान धुएँ से भरा हूआ !


जब देखना चाहा,

धुआँ कहाँ से निकल रहा है,

हर बार मैंने जाना,

धुआँ तो मेरे ही सपनों के,

जलने से निकल रहा था !


तब बात थी,

सुबह की आस में,

रातों में जागना अच्छा लगता था,

रातें बहुत प्यारी लगाती थी !


अब तो बस, डर-सा है,

की कौन-सा सपना,

जलता देखना पड़ जाए !

Poem Dream Smoke

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