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एक और मेघदूत
एक और मेघदूत
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© Suresh Rituparna

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कहीं दूर से

थके चले आते

काले धुएँ के बादल

मुझसे आ लिपट जाते हैं

मेरा चेहरा

भयाक्रांत

सफ़ेद होता जाता है

 

मुझे लगने लगता है

कालिदास झूठा था

कैसे ले जाते होंगे

वे काले मेघ

यक्ष का प्रेम संदेशा ?

कि ये काले बादल तो

हर बार

भय का ही संदेशा

लाये हैं मेरे नाम

 

भविष्य का युद्ध

मेरे वर्तमान से आ चिपकता है

मैं देखता हूँ---

युद्ध पीढ़ी की नसों में

भर दिया गया है बारूद

और

फेफड़ों में छिपा दिये गए हैं

एटम बम

  

न जाने कब

कहाँ से

ऐसा ही कोई काला बादल

उमड़ आयेगा

धुएँ में छिपी

चिनगारी

बारूद में घुस जायेगी

फेफड़ों में छिपे एटम बम

एक-एक कर फूटते जायेंगे।

 

कहीं कोई नहीं

मैं असहाय......

भयाक्रान्त.........!

एक और मेघदूत

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