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'भले आदमी!'
'भले आदमी!'
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© Arpan Kumar

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अरे मत पूछो यार वह बहुत घटिया आदमी था...एक भला आदमी दूसरे भले आदमी से रात्रि के यही कोई पौने नौ बजे दक्षिणी दिल्ली के एक बस-स्टैंड पर बैठा अपनी टाँगें झुलाते हुए और मूँगफली के छिलके यत्र-तत्र फेंकते हुए यह शास्त्रीय चर्चाकर रहा था।

तभी दूसरे भले आदमी ने कहा, ‘यार उसके कारण ही हम दोनों आज यह दिन देख रहे हैं। उसी ने हमारा ट्रांसफर यहाँ कराया। जब से उसका हमारे जीवन में प्रवेश हुआ तब से अपनी ग्रह-दशा पूरी की पूरी बदल गई। पुराने ऑफिस में इसने रहने न दिया और नए ऑफिस में यह नया कनखजूराआ गया। नहीं तो क्या ठाठ से अपनी नौकरी चल रही थी।

 

अब पहले वाले भले आदमी की बारी थी, ‘यार, अपना यह बॉस तो हमारे साथ ज्यादती कर ही रहा है मगर यहाँ तक हमें पहुँचाया किसने !....उसी चोपड़ा के बच्चे ने न! हमारी इस हालत के लिए मैं तो अपने इस बॉस से अधिक उस पुराने वाले बॉस को ही अधिक जिम्मेवार मानता हूँ।’

 

दोनों भले आदमी बस स्टैंड पर खड़े अपने घर की तरफ जाने वाली रूट के बस का इंतज़ार कर रहे थे।मगर बस थी कि आने का नाम ही नहीं ले रही थी। दोनों ने ऑफिस से चलते हुए जो मुँह में गुटखा रखा था, उसे चबाते हुए और मुँह में रखे हुए अब तक काफी देर हो गई थी। उसे एक-एक करके दोनों ने इस अदा और बहादुरी से फेंका कि पच्च से सड़क के एक किनारे कत्थई रंग की एक मोटी लकीर बनती चली गई।

अक्सर ही ये दोनों भले आदमी समय से पहले ही ऑफिस से निकल बाहर आने में उस्ताद थे। सालों से इनका यही क्रम जारी था। मगर इधर कुछ महीनों से इनकी स्थिति में बदलाव आ गया था। वो कहते हैं न हर दिन रहत न एक समाना...। मगर इन दिनों एक तो ऑफिस में स्टॉफ का टोटा और फिर आजकल नया-नया फैशन में आया काम का कोटा...इधर कई महीनों से ऑफिस से निकलते-निकलते दोनों को कुछ अधिक देर हो रही थी। मगर आज तो हद हो गई। पिछले सारे रिकॉर्ड टूट गए। ये दोनों सोचते...क्या नया बॉस एकदम से घर के लिए अनुपयोगी है क्या...साढ़े नौ दस बजे तक तो ऑफिस में रुकना उसके लिए आम बात सी हो गई है। कोई न कोई स्टॉफ उससे आए दिन ख़फा रहता है। कभी श्रीवास्तव जी तो कभी त्रिपाठी जी...आए दिन किसी न किसी आँच पर गिरती ही रहती है। इन दोनों पर तो जाने क्यों उसकी कुछ खास नज़र थी।       

 

ये दोनों भी क्या करें...आदत से मजबूर जो हैं। आखिर लंचमें पार्क में धूप सेंकते हुए और तीन-तीन घंटों तक ताश खेलने का मज़ा न लिया तो ऑफिस जाने का क्या अर्थ हुआ! संयोग से दोनों भले आदमी सहकर्मी और पड़ोसी भी थे। एक का नाम था शर्मा जी और दूसरे का वर्मा जी। दोनों की कद-काठी, बोली-बानी , आचार-विचार सब एक जैसा था। लगता है ईश्वर ने दोनों को एक ही साँचे में रखकर बनाया हो। दोनों मानो एक-दूसरे के कार्बन-कॉपी थे। क्या ऑफिस और क्या मुहल्ला! दोनों हर जगह काफी चर्चित थे। हाँ यह दीगर है कि उनकी चर्चा हर तरह की निगेटिव बातों के लिए ही ज़्यादा होती थी। 

 

कहते हैं...ताकतवर से ताकतवर आदमी की भी हर समय नहीं चलती। ये तो मात्र मामूली सरकारी मुलाजिम थे। मगर साम दाम दंड भेद में इस तरह उस्ताद हो गए थे कि नीचे से लेकर ऊपर तक अपनी गोटी हर जगह इन्होंने फिट कर रखी थी। अपने ऑफिस को इन्होंने अपना घर बना लिया था। क्या अफसर और क्या क्या क्लर्क! सभी इनसे हार माने बैठे थे। मगर कहते हैं न कि आदमी धुप्पलसे नौकरी तब तक ही चला सकता है जब तक कि वह चल रही हो। जब कोई लगाम कसने वाला आता है तब ऐसे लोगों को दिन में ही तारे नज़र दिखने नज़र आ  जाते हैं। कोई सवा साल पहले आया चोपड़ा एक ऐसा ही अधिकारी था। शांत और सख्त । संजीदा और कायदे कानून का पक्का। इन दोनों भले आदमियों को जो पीछे के अधिकारी काबू में न ले सके और न उससे कोई काम करवा सके... चोपड़ाने इन्हें इस तरह और इतने चक्करों में लेकर घेरा कि ये दोनों एक महीने के भीतर पानी-पानी हो गए। और जब आखिर में उसे इनके कई दबे-छिपे कारनामों के बारे में पता चला तो ऐसी जगह पोस्टिंग करवाई कि वहाँ इन्हें सरकारी पद के दुरुपयोग का मौका ही न मिल सके।

हमारे गण इन दिनों ठीक काम नहीं कर रहे  हैं। जब आलसी और स्वार्थी लोगों के गलत अवसर से कमाने के दरवाजे बंद होने लगते हैं तब इन्हें ऐसे ही जुमले याद आते हैं। जिस ऑफिस को इन्होंने अपना दुर्ग बना लिया था वहाँ नए नए ज्वाइन किए चोपड़ा ने न सिर्फ उनकी मिट्टी पलीद की बल्कि शीघ्र ही वहाँ से उसका ट्रांसफर भी करा दिया।

नए ऑफिस में पदभार  ग्रहण करने से पूर्व उनके तमाम किस्से वहाँ पहुँच गए थे। दोनों को लोगों ने ज्यादा घास नहीं डाली। वहाँ उन्हें  एक साथ कई काम पकड़ाए गए, जो नए भी थे और तात्कालिक प्रवृत्ति के भी। और उसके बाद तो उनकी वर्षों की मटरगश्ती पर मानों किसी ने लगाम ही कस दी हो। हालाँकि अभी भी ये दोनों अपने दूसरे साथियों की तुलना में काफी कम काम करते मगर जिसे एकदम से मुफ्त की रोटी तोड़ने की लत लग गई हो उसे तो दिनभर में तीन-चार घंटे का काम भी ज़्यादा ही लगता है।

रात के साढ़े नौ बज रहे थे। सड़क पर बढ़ता ट्रैफिक अब धीरे-धीरे कम होने लगा था। जिसे देखिए उसे घर जाने की जल्दी थी। गहराती रात और बढ़ती ठंड इसमें कदाचित दोनों की ही भूमिका थी। ये दोनों हज़रात भी अब तक काफी थक गए थे। मगर बावजूद इसके बस-स्टैंड पर बैठे-बैठे ये दोनों अपनी ही तरह बस का इंतज़ार कर रहे अन्य लोगों पर अपने व्यंग्य-बाण चलाने से कहाँ चूकने वाले थे! यह इनकी पुरानी शगल जो थी। अपने अंदर की चिड़चिड़ाहट को बाहर निकालने का यह इनका एक आजमाया हुआ नुस्खा भी था। ...वो कहते हैं न...अपने अंदर का फ्रस्ट्रेशन दूसरों पर थोप दो।...इनका दिमाग चाहे ऑफिस के काम में जितना सुस्त हो अपने फायदे में हमेशा ही तेज चलता था। इस तरह की फिकरेबाजी को दोनों सबसे अच्छा और मुफ्त टाईम पासमानते थे।

‘अरे यह नहीं कि आज बस में भीड़ पीछे से ज्यादा आ रही है...तो किसी तरह धक्का-मुक्की करते हुए बस में लद ही जाएं। या फिर ज़्यादा ही नाजुक मिजाज हैं तो भईया ऑटो करके चले जाएँ। वैसे भी आजकल देर रात दिल्ली के बस-स्टैंड पर हमारे जैसे शरीफ कम और गुंडे-लफँगे अधिक मँडराते रहते हैं’...

पहले भले आदमी ने दूसरे भले आदमी से कही, मगर इतनी ज़ोर से कि वहाँ खड़े सभी लोगों ने सुनी। बात तो यह सामान्य रूप से कही गई थी मगर स्टैंड की बायीं तरफ एक कोने में अपना पर्स लटकाए एक प्रौढ़ा खड़ी थी, अभी-अभी की गई टिप्पणी का लक्ष्य उसकी ओर विशेष रूप से था। मूँगफली के दानों से चिपके दाँत दिखाते हुए दोनों एक-दूसरे की ओर देख एक भद्दी हँसी हँसे और एक-दूसरे को आँख मारी। संभव है कि ऑटो से घर जाने की बात करके ये दोनों भले लोग अपने अंदर की झेंप को मिटाना भी चाह रहे थे। दोनों को एक-दूसरे के बारे में मालूम था कि कोई भी आगे बढ़कर ऑटो की बात तो खैर नहीं ही करेगा। दोनों पक्के मित्र थे मगर जहाँ किसी और पर पैसा खर्च करने की बात होती दोनों विशुद्ध रूप से बनिए बन जाते। ...दोनों शरीफ लोगों को एक-दूसरे की शराफत का अंदाज़ा भी था।...दोनों में से जो कोई पहले ऑटो की बात करता डेढ़-दो सौ की चपत उसे ही लगनी थी। दो देशों की किसी अंतर्राष्ट्रीय सीमा-विवाद जैसा कोई मुद्दा हो तो दोनों सजग और सामान्य रूप से ऐसे ही किसी विषय पर एक राजनयिक चुप्पी लगा बैठते ।

दोस्ती या तो दो भले लोगों की लंबी चलती है या फिर दो काईंयाँ लोगों की। पहली श्रेणी में किसी के लिए ज़रूरत पड़ने पर सामर्थ्य से अधिक करने की एक निष्पाप मंशा होती है ...इसलिए वहाँ दोस्ती लंबी चलती है। वहीं दूसरी श्रेणी में कोई किसी को पटखनी नहीं दे पाता है, इसलिए दोस्ती लंबी खींच जाती है। दूसरे ....बुरे व्यसन भी कोई न कोई संगति तो खोजते ही हैं। कई बार एक सज्जन आदमी जीवन भर अकेला रह सकता है मगर कोई दुर्जन अकेला अपना काम करता दिखे, ऐसे उदाहरण कम ही देखने को मिलते हैं। शर्मा जी और वर्मा जी इसी द्वितीय श्रेणी की मित्रता में आते थे। खैर कुछ देर में एक बस आई और वह महिला उसमें जैसे-तैसे चढ़ कर चली गई। यह बताना मुश्किल है कि वह बस उसके रूट की थी या नहीं या फिर उसे बस में जगह मिली या नहीं।...बस के अंदर जैसी हालत थी कम से कम कुछ दूर तक तो उसे ठीक से पैर रखने की भी जगह शायद ही मिली हो।...हाँ, यह अंदाज़ लगाना कदाचित गलत न होगा कि तथाकथित इन शरीफ लोगों की विशेष टिप्पणियों से तंग आकर और सुनसान होती जाती रात में थोड़ी डरती हुई उसने किसी भी बस में बैठकर यहाँ से हट जाने में ही राहत महसूस की हो। शाम में जल्दी ही उतर आती जाड़े की रात क्रमशः गहराती जा रही थी और अब ये दोनों महोदय ही बिना टीन की शेड वाले बस-स्टैंड पर नीम रोशनी में खुले आकाश के नीचे स्टील  के गोल पाईप पर बैठे नज़र आ रहे थे। अब इनकी परेशानी पेशानी पर त्यौरियाँ चढ़ाने लगी थी। इधर बस का हाल ऐसा कि अब आधे-आधे घंटे तक उनके  दर्शन ही नहीं हो पा रहे थे। फिर कोई बस इठलाती हुई आती भी तो इस रूट की उस पर बैठना इन दोनों के लिए यूँ बेमतलब गोल-गोल घूमने से अधिक कुछ न था।

समय अपनी गति से आगे बढ़ रहा था। अब तक जो बस आ रही थी...ठसाठस भरी हुई आ रही थी और अब आलम यह था कि आधे-आधे घंटे तक कोई बस ही नहीं आ रही है| बड़ी मुश्किल हो जाएगी....ऐसे में तो आज घर पहुँचना एक मुश्किल काम हो जाएगा!

घर पहुँचने की चिंता अब इन दोनों फिकरेबाजोंको कुछ तल्खी से सताने लगी थी। ऐसे में किसी को तो चुप्पी तोड़नी ही थी। ...शर्मा जी ने आगे बढ़कर वर्मा जी से कहा, ‘क्या किया जाए वर्मा जी...आज तो मानों दिन और रात दोनों ही हमारे खराब निकले! दिन में काम का कोटा...रात में बस का टोटा...’। शर्मा जी ने जिस तरह मुँह बनाकर कहा, पहले वर्मा जी और बाद में खुद शर्मा जी दोनों ठठाकर हँस पड़े। वो कहते हैं ना...मुश्किल से मुश्किल घड़ी में भी शोहदे अपने हिसाब से कोई तुक बिठा ही लेते हैं। ईश्वर के घर से दोनों को यह कला बराबर मिली थी। वर्मा जी मूड में आते हुए बोले, ‘...अरे वाह शर्मा जी....आपने भी क्या तुक मिलाई है....यह तो वही बात हो गई जब हम अपने उस पुराने बॉस के लिए लंच में कैंटीन में सबके बीच कहा करते थे...उसी घटिया और दंभी आदमी के लिए...’ शर्मा जी की आई.क्यू. कहाँ कम थी! तुरंत पकड़ लिए वर्मा जी का आशय ।‘...कौन वही चोपड़ा...’। फिर कुछ देर रुककर और पुरानी स्मृतियों का भरपूर मज़ा लेने की गरज से शर्मा जी ने बिना कुछ चढ़ाए झूमते हुए बोले, ‘वर्मा जी...अरे भई ज़रा हो जाए...वही नारा जिसके लिए हमें उस ऑफिस से तड़ीपार किया गया था...ये दोनों दोस्त अपने उस ट्रांसफर को अपने जीवन के लिए तड़ीपार ही समझते थे। मगर दोनों की संगति नहीं टूटी थी, इसका उन्हॆं संतोष भी था। और चोपड़ा ने जाने क्यों उनका ट्रांसफर अलग अलग नहीं किया, इसे लेकर उन्हॆं आश्चर्य भी होता। यह रहस्य की एक ऐसी गुत्थी थी, जिसे दोनों सुलझाना चाहते थे मगर आज तक किसी को भी इसमें सफलता नहीं मिली। यह रहस्य जैसे चोपड़ा के दिल में ही दफन था।  

वर्मा जी जोश में आकर कुछ ज़ोर से बोले,‘कल का छोकरा, बॉस बना चोपड़ा...दोनों को पता ही नहीं चला कि इस हँसी-ठट्ठा में वे बस-स्टैंड के पेवमेंट से उतरकर नीचे सड़क पर आ गए थे। तभी... सर्र  से आकर उनके पास एक कार रूकी। दोनों दोस्तों की नज़र जो कार पर और कारवाले पर पड़ी तो थमी की थमी रह गई। अभी अभी दोनों मिलकर जिस शख्स की प्रशंसामें कोई कसर बाकी नहीं छोड़े हुए थे, अचानक उसी शख्स ने बस-स्टॉप पर आकर गाड़ी रोकी और हॉर्न न मारकर अपनी खिड़की के शीशे नीचे करके उन दोनों को इशारों-इशारों में अपनी गाड़ी के भीतर बुलाया। दोनों भले लोगों ने आँखों ही आँखों में एक-दूसरे से कुछ कहा। गाड़ी के अंदर बैठा शख्स वही उनके पुराने ऑफिस का बॉस चोपड़ाथा, जिसका स्तुति-गान कोई घंटाभर से ये दोनों शरीफ लोगकर रहे थे।...दोनों गाड़ी के अंदर मजे से धँस गए। बाहर की ठिठुरती ठंड और बस के आगमन की अनिश्चिंतता कहीं पीछे छूट गई थी। दोनों ने राहत की साँस ली और इस बिन माँगी फरियाद के  पूरा होने पर अंदर ही अंदर कहीं निश्चिंत से हो गए थे। गाड़ी के अंदर एफ.एम.के किसी चैनल पर गज़लों का कोई कार्यक्रम आ रहा था। शब्दों और गायकी का एक मिला-जुला प्रभाव वातानुकूलित कार में बाहर के कर्कश शोर को काफी हद तक निष्प्रभावी किए हुए था। चोपड़ा साहब गंभीर होकर उन गज़लों को सुनने में तल्लीन थे। साथ ही उतनी ही संजीदगी से गाड़ी भी ड्राईव कर रहे थे। दोनों भले लोगों को गज़लों के अर्थ और उसकी गायकी से दूर-दूर तक लेना-देना न था। मगर मरता क्या न करता! कुछ तो बोलना ही था।...क्या बात है चोपड़ा साहब आपकी पसंद भी कितनी क्लासिकल है!...पहले आदमी ने ही ही करते हुए अपनी बात रखी। दूसरे भले आदमी ने ही-ही करते हुए पहले भले आदमी की हाँ में हाँ मिलाई। चोपड़ा साहब मंद-मंद मुस्कुराते हुए गाड़ी चलाते रहे। अभी एफ.एम. पर उनकी मनपसंद गज़ल आ रही थी जिसके बीच वे किसी तरह के न्यॉजको आने देने से बचना चाहते थे। उधर उनके अंदर का ड्राइविंग-स्कील तेज दौड़ते हुए पहियों पर अलग हिचकोले खा रहा था। वे अपनी इस मस्ती में अपनी सस्ती प्रशंसा को भी आने देना नहीं चाह रहे थे।...और इन सबसे आगे बढ़कर चोपड़ा साहब इन भले लोगों की भलमनसाहत से भी खूब परिचित थे। गिरगिटों की तरह रंग बदलने की इनकी आदत को अच्छी तरह पहचानते थे। मन ही मन सोचे...इनकी प्रशंसा हो या इनकी गाली...क्या फर्क पड़ता है! दोनों का घर जिस गली में पड़ता था, उसके मुहाने गाड़ी रोककर वे अपनी धुन में आगे निकल गए। अपने घरों की ओर बढ़ते हुए दोनों भले आदमी एक-दूसरे से चर्चा करते हुए जा रहे थे...बड़ा अकड़ू आदमी है...हमसे कुछ बातचीत करना भी मुनासिब ना समझा। जाने क्या समझता है अपने आपको...एक ए.सी. गाड़ी क्या खरीद ली है...अपने को खुदा समझने लगा है...साले ने ठीक से बात भी नहीं की है!.. हुँह...बड़ा घटिया और घमंडी आदमी है! दोनों झूमते हुए यह संत वाणी उचार रहे थे। ये दोनों भले आदमी हर तरह की खबर रखने में अपने आप को उस्ताद समझते थे मगर इन दोनों को यह दूर-दूर तक मालूम नहीं था कि उनके इसी पुराने  बॉस चोपड़ा के बच्चेने उनके वर्तमान ऑफिस में नए नए आए उनके सख्तमिज़ाज बॉस को इन दोनों पर विशेष नज़र रखने और इनकी लगाम खींचे रखने के लिए पहले ही ताकीद कर रखी है।

ऑफिस के कुछ जीवंत दृश्यों और उठा-पटक के बीच कार्यरत दो निकम्मों को नियंत्रित करने की कहानी...

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