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© Usha Arun

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आज की औरत को तुमने जब हाथों में चूड़ियाँ पहनाईं, कलाइयाँ सुन्दर लगने लगी। मगर ये क्या? चूड़ियाँ तो हाथों की हथकड़ियाँ बन गईं। पाँवों में पायल पहनाए। छम छम कर चलना भाने लगा। मगर पाजेब तो बेड़ियाँ बन गईं। नाक में लौंग डाला। चेहरे की रौनक ही बढ़ गई। मगर वो तो नाकों की नकेल बन गईं। और मैं जैसे खूंटे से बंधकर रह गई। माँग का सिन्दूर, मेरे लिए सौभाग्य की बात थी। मगर तुमने ये सोचकर डाला, कि उसके केमिकल्स, मेरी चंचलता कम कर देंगे। माथे की बिंदिया तो, तुम्हारा चैन लूटने को डाला था। मगर वो तो मेरे अस्तित्व के लिए, कलंक का टीका साबित हुआ। इन सारे ज़ेवरों से लदी मैं! दम घुटने लगा था मेरा। और मैंने फैसला कर लिया। सब उतार दूंगी। चूड़ियाँ उतारीं तो, हाथ खुद ब खुद अपने हक़ के लिए उठ गए। पाजेब उतारा तो, क़दमों ने चाँद की दूरी भी तय कर ली। लौंग उतारकर, खुद को खूंटे से आज़ाद कर लिया। सिन्दूर हटाया और तुम्हारे कंधे से कन्धा मिलाकर, चलने की हिम्मत आ गई। और माथे की बिंदिया उतारकर, लड़की होने का जो कलंक, समाज ने लगाया था, उसे धो डाला। और मैं अब आज की औरत हूँ....। 

समाज औरत बेड़िया आजादी

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