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                अपनों की बेवफाई
अपनों की बेवफाई
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© Mukesh Nirula

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जब तक मुझ में कुछ साँसे थी, मैं जीवन पर इतराता था लोगों की मदद करते-करते, जीवन को जीता जाता था इस जीवन को जब तक था जिया, लोगों से प्यार बढ़ाया था जब मेरी साँसे भी थम सी गयी, क़ब्र पर सबने पहुँचाया था मैं कब्र में लेटा था कब से, कोई मिलने ना आता था क्यों लोगों से था प्यार किया, यह सोच के मैं पछताता था फिर इक दिन ऐसा भी आया, कोई मुझसे मिलने आया मेरी इस कब्र पर कोई, इक दीप जलाने था आया मैंने सोचा शायद उसको, मैं फिर से याद तो आया था इसलिऐ वो तो इस दीवाली में, कुछ दीप जलाने आया था जब ध्यान से मैंने देखा उसे, वो तो इक अंजाना था उसने तो इस दीवाली में, कुछ दीपों को ही जलाना था

जीवन कब्र अंजाना

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