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वो फुटपाथ पे मौत
वो फुटपाथ पे मौत
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© Ankush Srivastava

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ज़िंदा है उम्मीद पर, वो जो फुटपाथ है सोया,

पाल रहा है मुसीबतें, ना जाने किसने था बोया,
किस्मत पर अपने, बेचारा खूब है रोया,
गरीबी में उसने, बहुत कुछ है खोया।

छोड़ आया है परिवार गाँव में,
भूखे-प्यासे, मरते होंगे,
सोच यहाँ डूबा रहता है,
रात-रात वो डरते होंगे।

बस इक दिन गाड़ी आती है,
उम्मीदों को कुचल जाती है,
सपनों में मर ही जाता है,
लौटकर वो घर नहीं आता है।

रोते हैं घरवाले सारे,
पुलिस को बस पैसे प्यारे,
वकील आते, कहते नोट दो,
नेता आते, कहते, "इन्साफ मिलेगा, पहले वोट दो"।

विधवा बच्चों संग बैठी है,
घर में ना पैसे, ना रोटी है,
वो घर भी दुनिया वालों से देखा नहीं जाता,
और किस्मत धीरे-धीरे सब कुछ है खा जाता।

उस पानी में गई भैंस जैसा हो जाता है इन्साफ,
और वो गरीब भी क्या करे, कर देता है गाड़ी वाले को माफ़,
उस गरीब की वो घड़ी एक निशानी बनकर रह जाती है,
और वो फुटपाथ पे मौत, बस एक कहानी बनकर रह जाती है। 

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