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शोर ए दिल
शोर ए दिल
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© Shashi Mehra

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उसकी कोई चाल मैं समझा न था

वो मेरा हिस्सा था, पर मेरा न था ॥

वो स्याह्कारों में था शामिल मगर

पैरहन पर एक भी धब्बा न था ॥

उसको समझाना गया बेकार सब

वो किसी भी बात पर ठहरा न था ॥

क्यों भला करता यकीं मैं ग़ैर पर

मेरा साथी जब मेरा साया न था ॥

जिसको मैं हमदर्द था समझा किया

वो था इक पत्थर, कोई झरना न था ॥

आईने को देख कर हैरत हुई

उसमे जो चेहरा था, वो मेरा न था ॥

आज महफ़िल बिन ‘शशि’, खामोश है

वो बिछुड़ जायेगा, ये सोचा न था॥

साया यकीं धब्बा

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