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उन्हीं के वास्ते
उन्हीं के वास्ते
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© Qamar Abbas

Fantasy

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उन्हीं के वास्ते सूरज में आई है नरमी;

उन्हीं के वास्ते बढ़ने लगी है सरगर्मी;

उन्हीं के वास्ते रौशन हुए हैं सब जुगनू;

उन्हीं के वास्ते ख़ुशबू हुई है बेकाबू;

उन्हीं के वास्ते पागल हुई है बादे-सबा;

उन्हीं के वास्ते गुलशन पे छा गया है नशा;

उन्हीं के वास्ते तारे ज़मीं पे उतरे हैं ;

उन्हीं के वास्ते सहरा में रंग बिखरे हैं;

उन्हीं के वास्ते बादल हुए हैं दीवाने;

उन्हीं के वास्ते सच्चे हुए हैं अफ़साने;

उन्हीं के वास्ते इठला रहा है आज चमन;

उन्हीं के वास्ते हैं फूल सारे मह्वे-सुख़न;

उन्हीं के वास्ते सारे फितूर हैं शायद;

उन्हीं के वास्ते हम चूर चूर हैं शायद;

उन्हीं के वास्ते आहो-बुका है सीने में;

उन्हीं के वास्ते दिल रो रहा है सीने में;

उन्हीं के वास्ते सहते रहे हैं जुल्मों-सितम;

उन्हीं के वास्ते चलती रही हमारी क़लम;

हम अब जो जान से जाए तो कोई बात बने;

वो रुख़ से पर्दा हटाएँ.. तो कोई बात बने।।

 

 

 

अब्बास क़मर

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