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किस राह जाएँ हम
किस राह जाएँ हम
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© Saurabh Sood

Drama

1 Minutes   13.4K    26


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इस दिल की लगी आग को,

किस तरह बुझाएँ हम,

जब जलती हो रूह तो कहो,

किस राह जाएँ हम ।


कहीं उठता देख धुआँ,

फिर ये सुलग़ उठी हैं,

अब है यही तदबीर कि,

जिस्म को जलाएँ हम ।


जिन मरासिम की आग में,

जूफिशाँ है ये आशियाँ,

उन्हीं निस्बत की ख़ाक़ में,

खुद को दबाएँ हम ।


जलने को तो जलती है,

इक शमा भी दयार में,

किसे दीग़र की सूरत-ए-शमा,

ये दिल जलाएँ हम ।


जहाँ की सुनें, या दिल की करें,

समझ नहीं आता,

चाहते हैं वो की, ज़मीर की लाश,

खुद ही उठाएँ हम ।


नज़र ने देखे नज़ारे,

पर यूँ न कभी होते देखा,

अपने जिग़र की राख को,

बदमस्त उड़ाएँ हम ।


ज़माने ने इतना सताया,

कहीं अब आये न चैन,

अब तो है ये आलम 'शौक़',

खुद को सताएँ हम ।


क्यों ग़म-ए-राह में,

किसी को शरीक़ अब करें,

अपनी मय्यत में भी अब तो,

अकेले आएँ हम ।


दर्द जब आदत बना,

किस तरक़ीब से छोड़ दें,

दाम-ए-शुनीदन देखकर,

ख़ुद को फसाएँ हम ।


लुट गए सर-ए-रहग़ुज़र,

औरों का क़सूर क्या,

ग़ौर करें तो इस दिल ही को,

ख़तावार पाएँ हम ।


ख़लिश ग़र जिस्म में हो,

जिस्म ही को मिटा दें,

है ख़लिश मगर रूह में,

तो कैसे मिटाएँ हम ।


रिश्तों को हासिल रहा,

दर्द-ओ-अश्क़-ओ-रंज-ओ-ग़म,

बेहतर है उन रिश्तों को,

अब भूल ही जाएँ हम ।

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