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सन्तरे का छिलका
सन्तरे का छिलका
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© Qais Jaunpuri

Inspirational Comedy

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ट्रेन रुकी
दो मैली-कुचैली सी
ग्यारह-बारह बरस की लड़कियाँ
भीड़ को धक्का देते हुए
एक जेन्ट्स डिब्बे में
दूसरी लेडीज़ में चढ़ी
एक के हाथ में
ताड़ के पत्‍ते का
नया ख़रीदा हुआ झाड़ू
दूसरे के हाथ में
उसका हौसला था
दोनों का लिबास
धूल-मिट्टी से सना था
चेहरा उनका
गन्दगी जम-जम के
पुराने ताँबे जैसा हो रहा था
फिर जेन्ट्स डिब्बे में चढ़ी लड़की
बिना किसी की इजाज़त
फटाफट झाड़ू लगाने लगी
झाड़ू उसने इस तरतीब से फिराया
कि ट्रेन का फ़र्श जैसा था
वैसे का वैसा ही रहा
फिर वो सबके सामने
हाथ फैला के
अपनी मजूरी माँगने लगी
भला उसे किसने कहा था
कि झाड़ू लगा, हम मजूरी देंगे
तो सबने कहा, माफ़ करो
जिसका मतलब था, आगे बढ़ो
माफ़ करो, सुनके
उसके नथुने
ग़ुस्से और अफ़सोस से
फैलने-सिकुड़ने लगे
देखने वालों ने देखा
उसके सीने पे दुपट्टा नहीं था
उसकी छोटी-छोटी छातियाँ
जवानी की ओर बढ़ रही थीं
थोड़ी हमपे दया कर दो
उसकी आँखें कह रही थीं
लेकिन देखने वालों की आँखें
जो चारों तरफ़ से
उसके बदन में गड़ रही थीं
उसकी आँखों से घबराकर
अपनी आँखें
दूसरी ओर
फेर ले रही थीं
फिर वो इसी तरह हाथ फैलाए
पूरे डिब्बे में घूमती रही
और माफ़ करो, आगे बढ़ो, सुनती रही
दूसरी जो लेडीज़ के डिब्बे में चढ़ी थी
सबके सामने हक़ से हाथ फैलाए खड़ी थी
उसने अपने दुपट्टे का फेटा बनाकर
कन्धे और कमर में
लपेट लिया था
उसका दुपट्टा
जो उसकी दोनों छातियों
के बीच से गुज़रते हुए
उसके कन्धे पे जा रहा था
उसकी नन्हीं-नन्हीं छातियों का रूप
निखार रहा था
तभी अगला स्टेशन आ गया
जैसे दोनों को कुछ याद आ गया
दोनों कूदींऔर एक-दूसरे से ऐसे मिलीं
जैसे बरसों की बिछड़ी हों
तुझे कितना मिला?
दोनों ने दोनों से पूछा
एक ने झाड़ू अपनी बगल में दबाया
और पैसे वाला हाथ आगे बढ़ाया
एक-एक रुपए के दो सिक्के थे
जो उसके हाथ की मैल से
गन्दे-मटमैले हो गए थे
दूसरी ने भी हाथ बढ़ाया
मुझे ये सन्तरा मिला है, बताया
सन्तरा, जो सन्तरे से भी छोटा था
बिल्कुल उसके नसीब जैसा खोटा था
मगर वो उसकी मेहनत की कमाई थी
जिसे बचाकर वो साथ लाई थी
ला, ये पैसे मुझे दे दे
और ये सन्तरा तू ले ले
दूसरी ने पहली से कहा
पहली ने दूसरी का मुँह देखा
तेरे इस पिद्दी से सन्तरे के लिये
मैं अपनी मेहनत की कमाई दे दूँ?
और फिर वो ‘हूँह’ कहके आगे बढ़ गयी
दूसरी उसके पीछे-पीछे इस उम्मीद से जा रही थी
जैसे उसे मालूम था
कि ये पागल एक रुपए का सिक्का लेके कहाँ जाएगी
जब भूख लगेगी तो सिक्का थोड़ी खाएगी
देखना, अभी थोड़ी ही देर में
मेरा सन्तरा माँगने ज़रूर आएगी
तब मैं उससे बिना सिक्का लिए
सन्तरा नहीं दूँगी
आख़िर मुझे भी तो हक़ है देखने का
कि एक रुपये का सिक्का कैसा होता है
तभी पहली सच में पलटी
ला दे, चखा न ज़रा सा
ना, पहले तू सिक्का दे
अरे दूँगी ना, तेरा सन्तरा मीठा नहीं हुआ तो?
दूसरी ने सन्तरा जल्दी से छीला और उसका छिलका
पहली को पकड़ा दिया
तो ले, चख के बता

 

लोकल ट्रेन अनाथ बच्चियां

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