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पत्रोत्कंठित जीवन का विष
पत्रोत्कंठित जीवन का विष
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© Suryakant Tripathi Nirala

Classics

1 Minutes   139    7


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पत्रोत्कंठित जीवन का विष बुझा हुआ है,

आज्ञा का प्रदीप जलता है हृदय-कुंज में,

अंधकार पथ एक रश्मि से सुझा हुआ है

दिङ् निर्णय ध्रुव से जैसे नक्षत्र-पुंज में ।

लीला का संवरण-समय फूलों का जैसे

फलों फले या झरे अफल, पातों के ऊपर,

सिद्ध योगियों जैसे या साधारण मानव,

ताक रहा है भीष्म शरों की कठिन सेज पर ।

स्निग्ध हो चुका है निदाघ, वर्षा भी कर्षित

कल शारद कल्य की, हेम लोमों आच्छादित,

शिशिर-भिद्य, बौरा बसंत आमों आमोदित,

बीत चुका है दिक्चुम्बित चतुरंग, काव्य, गति

यतिवाला, ध्वनि, अलंकार, रस, राग बन्ध के

वाद्य-छन्द के रणित गणित छुट चुके हाथ से--

क्रीड़ाएँ व्रीड़ा में परिणत । मल्ल भल्ल की--

मारें मूर्छित हुईं, निशाने चूक गए हैं ।

झूल चुकी है खाल ढाल की तरह तनी थी।

पुनः सवेरा, एक और फेरा है जी का ।

पत्रोत्कंठित जीवन का विष उत्कृष्ट रचना सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

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