Audio

Forum

Read

Contests

Language


Write

Sign in
Wohoo!,
Dear user,
धरती की पीड़ा को सुनकर
धरती की पीड़ा को सुनकर
★★★★★

© डॉ.केशरी शुक्ला

Drama Tragedy

1 Minutes   6.5K    2


Content Ranking

धरती की पीड़ा को सुनकर

अम्बर का दिल रीत गया

बाझों की चोचों से घायल

कोयल का संगीत गया

मौन बागबाँ खड़ा प्रतीक्षित

प्रलय गान सुन लेने को

श्रेष्ट समझता है वह केवल

बस निंदा कर देने को

हे ईश्वर करलो धरती

पर आने की तैयारी

दफ्न हो गई चीखों में

उम्मीदों की चिंगारी ।

पलकों से अधरों से

जिस बेटी को मैंने पाला

उस बेटी को कल

अखबारों ने नंगा कर डाला

गिद्धों ने नोचा होगा

मृत शव जैसे जंगल में

चीख रहे है आंसू बनकर

साक्ष्य सिंधु के जल में

हृदयहीन इस राजनीति

से न्याय याचना हारी

दफ्न हो गई चीखों

में उम्मीदों की चिंगारी ।


क्यों ना फटी धरती की

छाती जब वो तड़प रही थी

क्यों ना गिरा आकाश

वासना तन को मसल रही थी

धवल लहर गंगा की

क्यों ना रक्त वर्ण बन जातीं

और शिलाएं पर्वत की

आंसू में फिर सन जातीं

मानवता की हत्या पर है

मौन आज विधि सारी

दफ्न हो गई चीखों

में उम्मीदों की चिंगारी ।

Women Assault Earth

Rate the content


Originality
Flow
Language
Cover design

Comments

Post

Some text some message..