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कदमों तले सूरज
कदमों तले सूरज
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© Vikash Kumar

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आसमानों तक सीखचों की व्यवस्था है,

हर एक जान पिजड़े में कैद है,

उड़ानों पर पाबंदी का फरमान है,

केवल रसातल तक धंस जाने की इजाजत है,


खुल कर जीने की आजादी एक भ्रम है,

रोटी माँगना विद्रोह है, 

शिक्षा अमीरों की दासी है,

स्वास्थ्य पंचतारा चारदीवारी की रखैल है,


गरीबों की स्वांस तक प्रदूषित कर दी गई है,

अब गाँधी को खुले आम अहिंसा की

पैरवी नहीं करनी चाहिये,

गोडसे की बंदूक ट्रिगर दबाने को तैयार है,

घुट घुट कर मर जाने में लोगों की भलाई है,


जिंदा रहने का अधिकार सरकारों को तय करना है,

झूठे गवाहों की संख्या न्याय की दिशा तय करेगी,

शिक्षा की जरूरत इसलिए नहीं

ताकि जनता भोली भाली रह सके।


चुप रहकर मर जाने में किसी को कोई एतराज नहीं ,

जिंदा रहने के लिये आवाज उठाना कानूनी अपराध है।

सबकी सजा तय है, गरीबों का अपराध अक्षम्य है,

सरकारी खजाने में दान देकर

अपराध करने की छूट हो सकती है।


आजादी की भी एक हद होगी,

जिसको सरकारें आपकी धनाढ्यता से तय करेंगी।

गरीबों की अपनी सीमाएँ होंगी,

अमीरों की सीमाएँ उनके धन के समानुपाती होंगी।


रसातल में धँस चुके लोगों को लावा बनकर फूटना ही होगा,

कल्याण ज्वालामुखी बन जाने में ही होगा,

जिसके लावा को समेटना किसी सरकार के बूते नहीं

सीमाओं को नष्ट कर देना मोक्ष मिल जाने के समतुल्य है।

अपराध हद आजादी

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