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प्रिये ! वो आलिंगन तुम्हारा था
प्रिये ! वो आलिंगन तुम्हारा था
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© Vikash Kumar

Drama Romance

1 Minutes   13.7K    14


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जग में एक सहारा था,

मानो नदियाँ का किनारा था,

थके पथिक का साया बनकर,

सूखे दरिया का सहारा बनकर,

जीवन कर दिया निराला था,

प्रिये ! वो आलिंगन तुम्हारा था।


तुमने स्पर्श किया था मन को,

सुरसरी ने छुआ जैसे सागर को,

अधबुझी राख सदियों से दबी थी,

हमारे मिलन से धधक फिर उठी थी,

क्या यह डूबने का कोई इशारा था,

प्रिये ! वो आलिंगन तुम्हारा था।


बंजर धरा को मिला एक सहारा,

हमारा तुम्हारा साथ था निराला,

खिली हर कली हर भंवरा डोला,

गर्मी में बसन्त का अजब-सा पहरा,

यह कैसा जज़्बात सुहाना था,

प्रिये ! वो आलिंगन तुम्हारा था।


प्रिये की याद में धधकता रहा हूँ,

कभी यहाँ फिर कभी वहाँ जला हूँ,

तुम्हारे नयनों के आँसू से बुझुँगा,

साया तुम्हारा बनकर चलूँगा,

हमें ताल फिर तो मिलाना था,

प्रिये ! वो आलिंगन तुम्हारा था।


आज मुझे वो पल लौटा दो,

काजल में डूबा मधुमास लौटा दो,

आँचल प्यारा वो झंकार लौटा दो,

मेरे मनमीत वो प्यास लौटा दो,

क्या वो बस एक रात का सहारा था,

प्रिये ! वो आलिंगन तुम्हारा था।


ये अंधेरे या जुल्फों के साए घनेरे,

सांसो में सांसों से लिपटते सवेरे,

ये चित्रित-सी आशा या प्रणय अभिलाषा,

आँखों के जंगल में गहरी-सी गाथा,

खिसकता-सा आँचल सुहाना था,

प्रिये ! वो आलिंगन तुम्हारा था।

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