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स्त्री-द्वैत
स्त्री-द्वैत
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© Arpan Kumar

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 बहुत झीना पर्दा है

दुःख और सुख में

रोती हुई स्त्री जब

अपनी तमाम बेड़ियों में

जकड़ी रहकर भी

यकायक  जब हँसने लगती है

 

शोषक इतिहास के धुंआते किले

तब बदले समय की खुली बयार में

अपनी बेचारगी पर

अपना सिर धुनते नज़र आते हैं

 

 मगर तभी

हँसती हुई स्त्री

अचानक रोने लगती है ज़ार-ज़ार

और रुग्णचहारदीवारियों के भीतर से

आता बेखौफ अट्टहास

स्त्री रूदन को कहीं भीतर तक

 दबा देता है

 

अपराजेय भाव से मदमत्त होकर

दुःख और सुख की यह आँखमिचौली

एक स्त्री के भीतर कहीं दूर तक

अपना सुरंग रचती चली आ रही  है

जाने कितनी पीढ़ियों से                                                           

 

बहुत कम अंतर है

प्रकाश और अंधकार में

जूड़े कसती हुई स्त्री

अपनी छाती को उन्नत किए सगर्व

सूरज को चुनौती दे सकती है

तो वहीं फैलाकर  अपनी केश-राशि

अंधकार के विभिन्न गह्वरों और रहस्यों से

अपने तईं एक मांसल तिलिस्म भी रच सकती है

 

एक बारीक रेखा भर का अंतर है

आशा और निराशा में

 

स्त्री नदी बन जब

अपने पीछे तरलता छोड़ती चलती है

या फिर वक्त और परिस्थितियों के हाथों

सूखकर रेत और मिट्टी का सपाट मैदान ठहर

निर्मम और निरंकुश हाथों की कठपुतली

बन जाती है

 

सुई की नोंक भर भेद है

धैर्य और क्रोध  में

ज्ञान की प्रतिमूर्ति सरस्वती

अपने हाथों में पुस्तक की जगह

कब खड्ग उठा ले

और एक देवी का वाहन हंस

कब दूसरी के वाहन सिंह में

तब्दील हो जाए

कुछ कहा नहीं जा सकता

 

 बहुत मामूली भेद है

निर्माण और विनाश में

अपनी कोख और अपने रक्त से 

दुनिया का नवनिर्माण करने वाली स्त्री

अपनी उदासीनता और रूदन से

एक तपता, निर्जन रेगिस्तान खड़ा कर

सबकुछ तपता हुआ और अभिशापग्रस्त

भी छोड़ सकती है

  

कितनी बारीक रेखा है

वात्सल्य और विद्रोह के बीच

अपनी आँचल तले अबोध शिशु को

 एक पूर्ण, सक्षम पुरुष बनाने वाली 

 

कोई स्त्री जब

अपनी करने पर उतर जाए

तो अपने आँचल को परचम बना         

और लहराकर उसे

किसी आतततायी दुर्योधन-टोली  को

नष्ट करने का बीड़ा भी उठा सकती है

 

और प्रतिशोध की ज्वाला में धधकती हुई

अपने दुश्मन के रक्त से

अपना केश- स्नान भी कर सकती है

 

बहुत-बहुत रूप हैं

गोचर-अगोचर

नैतिक-अनैतिक

अच्छे-बुरे 

हर तरह के

 

इस जगत के और

अधिकाधिक भाव हैं हम सब के

 

इस जगत में

स्वयं से स्वयं के लिए

तो कभी एक-दूजे के लिए 

  

मनुष्यों का जीना और सोचना

जाने कैसे-कैसे सम-विषम धरातलों पर

 

कितने झंझावतों और अंतर्द्वंदों में

अनवरत रूप से प्रवाहमान रहता है    

और जाने यह कैसी समेकित करने वाली

शक्ति है एक स्त्री की

कि वह अपने तईं

परस्पर विरोधी दिखते इन भावों के द्वैत

को समाहित किए चलती है

सरलता और अपनी सहजता में

 

दुःख सुख स्त्री एक स्त्री के भीतर कहीं दूर तक अपना सुरंग रचती चली आ रही है जाने कितनी पीढ़ियों से" (इसी कविता से)

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