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स्त्री
स्त्री
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© Rashi Singh

Inspirational

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न पूछ कहाँ, कब टूटी हूँ

खुद से कितना मैं रूठी हूँ ,

फैला है कलेवर मुस्कानों का

भीतर ही भीतर रोती हूँ,

हर हक अदा करके भी मैं

रही सदा बड़ी उत्पीड़ितहूँ ,

ढलता सूरज जीवन का

अन्धियारों संग ही रहती हूँ,

सेहराओं से टकराकर

लहरों सी यहाँ वहाँ बहती हूँ ,

है दूर किनारा जीवन का अभी 

जाने कितनी दफ़ा मैं भटकी हूँ,

पीड़ा का आभूषण कर धारण ,

गिरती और कभी सँभलती हूँ,

बोझ लिये रिश्तों का मैं कभी 

राह नहीं भटकती हूँ ,

सौंदर्य और प्रेम का एक अप्रितम

एक निश्छल सा प्यारा संगम हूँ 

खौफ़ खाओ ए-भस्मासुर

मैं भी हान्ड़ -मास की हूँ ,

मैं कोमल और सुकोमल

ममता की मूरत स्त्री हूँ 

कलेवर निश्छल खौफ़

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