Quotes New

Audio

Forum

Read

Contests


Write

Sign in
Wohoo!,
Dear user,
"फिर आऐगा वसन्त"
"फिर आऐगा वसन्त"
★★★★★

© Arti Tiwari

Others

1 Minutes   13.3K    6


Content Ranking

हम जो चुपचाप बैठे हैं हताश से

अपनी ही लगाई गाँठों की ऐंठन में जकड़े से

प्रसन्नता से निर्वासित लोग हम

बदलेगा मौसम हमारे लिऐ भी

देखना फिर आऐगा वसन्त चुपके से

डालेगा बसेरा हमारे आँगन में

पीले नीले मिल नारंगी रंगों से

पूर पूर देगा हमारे गलियारे

खेतों में,बाग़ों में,गली कूचों में

हौले से बिखर जाऐगा  जैसे बिखर जाती है ख़ुशबू

साँसों की सरगम में,राग भोर का गाऐगा ,चूमेगा वल्लरी से झरती कलियों को

फ़ैल जाऐगा  वसन्त का जादुई उजाला सवेरे की रेशमी झालर में झिलमिल सा

टेसू के उन्मादी रंग से घुल जाऐगी  केसर सी

उसके आने की आहट से समीर बना रही अल्पनाऐं पराग कणों से

कोयल गाऐगी  मादक गीत

भौरों की गुनगुन में उसकी आमद का संगीत स्वर लहरियों में नाचने लगा है

अपने गिटार के तारों को छूकर छेड़ते ही वो उखाड़ फेंकेगा तुम्हारी उदासी की केंचुल

पपड़ाये होंठ हिलने लगेंगे और फिर से जीने लगेंगे

कब तक आखिर कब तक

भूख,हमे संत्रास देगी

वसन्त के आते ही होगा एहसास अनोखा तृप्ति का

जी उट्ठेगा जग सारा देखना

अँधेरे को चीर आऐगा  वसन्त

छा जाऐगा  हमारे दिलो-दिमाग पर वसन्त का मादक नशा

आऐगा वसन्त अपनी पूरी की पूरी जिजीविषा के साथ

 

 

फिर आऐगा वसन्त

Rate the content


Originality
Flow
Language
Cover design

Comments

Post

Some text some message..