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हो गये
हो गये
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© Harsh Bhrambhatt

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जब जवां मेरे दाग़े-जिगर हो गये
फीके फीके से शम्सो-क़मर हो गये

काम क्या आईने का हटा लो इसे
आप अपने से हम बे-ख़बर हो गये

राहे-माज़ी पे देखा अकेला मुझे
लम्हे तन्हाई के हम-सफ़र हो गये

साथ था उनका तब भी गुज़रते थे दिन 
दिन जुदाई के भी तो बसर हो गये

मैंने चलने का दिल मे इरादा किया
तय तसव्वुर में कितने सफ़र हो गये

शर्म से आसमाँ भी सिमटने लगा
जब जुदा पँछी से उसके पर हो गये

अब जहाँ सारा अपना लगे है उन्हें
लोग आज़ाद घर छोड़ कर हो गये

फूल, फल, छाँव, कुछ भी तो देते नहीं
आज कल लोग कैसे शजर हो गये

ग़ज़ल जुदाई धुप -छाँव

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