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ग़ज़ल
ग़ज़ल
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© Rakesh C Awasthee

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आप की बज़्म में तो सब खुल के मिला करते हैं,
हमारे चमन में फूल भी डर डर के खिला करते हैं।

नाचीज़ हूँ, शायद रख न सकूँ दोस्ती का पास ,
मेरे  दोस्त मुझ से क्यों दूरी का गिला करते हैं।

खूब वाक़िफ़ हैं ना माँगने की आदत से मेरी, ,
मेरे हमदर्द अब मुझ से रोज़ मिला करते हैं।

सिफ़ते नासूर शायद उनको मालूम ही नहीं,
दस्ते साक़ी से जो दिल के ज़ख्म सिला करते हैं।

तेरी रहमत से मैं आज भी मायूस नहीं हूँ ,
फरयाद दिल से हो तो पत्थर भी हिला करते हैं।

नाचीज़ - ordinary सिफ़ते नासूर- quality of wound which does not easily heal दस्ते साक़ी- hands of bar girl रहमत-bounty

 

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