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थका हुआ शहर
थका हुआ शहर
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© Prakash Patil

Inspirational

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रात के अंधेरे के सीने को चीरते हुए

ये उजालों के रास्ते कहां निकल पड़े है ?

वाहनों के साथ इन्सानों का बोझ उठाकर 

रास्तों का दम निकला हुआ सा है .. 

मन की गति को कम ही लग रही  है,

वाहन की गती...    

आगे -आगे दौड़ने की होड़ 

बन गई  है सबकी मजबुरी...  

ये रोशनी की जगमगाहट क्या छुपा पायेगी 

इस शहर की दीनता?

पहरेदार खर्राटे लेते हुए सोया हुआ ,

और ये ऊँची -ऊँची  इमारते 

अभी तक किसके इंतजार में जाग रही है ?  

आखिरी गाड़ी से कोई आ रहा है शायद,

नहीं जानता मगर, जिसे वो आखिरी समझ बैठा है ,

वह गाड़ी टाइम टेबल में पहली है... 

किसी को समझ में आने से पहले ही,

इस शहर का मोटापा फैलता जा रहा है...  

बुढ़ापे की और झुकने से पहले ही, 

यह शहर दम तोड़ता हुआ नज़र आ रहा है 

क्या यही थका हुआ शहर 

किसी समय हट्टा-कट्टा गांव हुआ करता था ? 

कविता शहर गाँव

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