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मात्रभूमि व भाषा
मात्रभूमि व भाषा
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© कुलदीप पाण्डेय आजाद

Inspirational

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चलता किस पथ पर जग सारा

नए नियम क्या हैं इसके

उग आए कंटक राहों पर

चलते फिर भी क्यों इस पे

नहीं समझता है कोई क्यों

अब इसकी अभिलाषा को

कोई ऐसा पथिक नहीं जो

बदल सके परिभाषा को

नई दिशा ये मांग रही है

फैला कर अपना आंचल

विधि पर निर्भर प्रगति चाक में

कहती कुछ लाओ हल-चल

क्यों जीव सभी इस वसुधा के

अब इतने अनुदार हुए

कोई ऐसा हृदय नहीं क्या

करुण वेदना जिसे छुए

मातृभूमि व उसकी भाषा

दोनों हमे पुकार रहीं

है मांग रही इतिहास नया

जिसमे हो अनुकार नहीं

हमे पुकार रही कहती है

ऋण मेरा कुछ कर दो कम

तुझसे मिलकर मैं तर जाऊँ

तर जाये तेरा जीवन

कोई नहीं किसी पर निर्भर

उस युग का निर्माण करे

छोटों को प्यार मिले उनका

बड़ों का सब सम्मान करे

अपने जीवन मे मनुज सभी

व्यस्त अगर हो जाएंगे

हमसे कहें आप ही कैसे

परिवर्तन हम लाएँगे !!

परिभाषा पुकार आंचल

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